क्या मृत्यु के बाद भी नाम उन तक पहुँच सकता है? | शास्त्रों का रहस्य
Naamjapofficial
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क्या मृत्यु के बाद भी नाम उन तक पहुँच सकता है? | शास्त्रों का रहस्य
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हाथ खाली हैं यह सच है। पर मुख खाली नहीं है।
जब घर से कोई चला जाता है, तेरह दिन लोग आते हैं, बैठते हैं, और फिर
लौट जाते हैं। उसके बाद जो सन्नाटा बचता है, उसमें एक ही वाक्य बार-बार
उठता है — "अब मैं इनके लिए कुछ नहीं कर सकता।"
यह पूरा प्रवचन उसी एक वाक्य के विरुद्ध है।
राजा चित्रकेतु की कथा, और वह आत्मा जो लौटकर बोली श्रीमद्भागवत का
वह प्रसंग जो शोक और मोह का भेद खोल देता है। स्वयं यमराज का वह वचन
जो उन्होंने अपने दूतों को दिया। और वह विधान जो हमारी परम्परा पीढ़ियों
से करती आई है — संकल्प, नाम, और पुण्य-अर्पण।
अंत में — देहरी पर रखा वह दीपक, जो भीतर और बाहर, दोनों ओर जलता है।
00:00 "अब मैं इनके लिए कुछ नहीं कर सकता"
00:47 शोक मना नहीं है — भ्रम मना है
01:38 राजा चित्रकेतु
02:41 वह आत्मा, जो लौटकर बोली
03:43 सम्बन्ध झूठे नहीं थे
04:45 उन तक क्या पहुँच सकता है
05:30 तेरह दिन — रीति नहीं, भेंट
06:19 स्वयं यमराज का वचन
07:12 संकल्प — यह किया कैसे जाता है
08:11 पुण्य-अर्पण
08:58 तेरह दिन पर समाप्त नहीं होता
09:49 देहरी पर रखा दीपक
10:56 समापन
इस प्रवचन में उद्धृत श्लोक —
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय २, श्लोक १३
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय २, श्लोक २२
श्रीमद्भागवत — स्कन्ध ६, अध्याय ३, श्लोक २२
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ९, श्लोक २२
श्रीरामचरितमानस — बालकांड, दोहा २१
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