हमको अपने गाँव बुलाते हैं | विस्थापन और मातृभूमि का दर्द | INNAMAX Voice
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हमको अपने गाँव बुलाते हैं | विस्थापन और मातृभूमि का दर्द | INNAMAX Voice
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कुछ गाँव कभी छूटते नहीं… वे उम्र भर भीतर बसे रहते हैं।
“हमको अपने गाँव बुलाते हैं” एक ऐसा गीत है जिसमें कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के बाद अपनी मातृभूमि, पुश्तैनी गाँव और छूटी हुई ज़िंदगी को याद करने की पीड़ा सुनाई देती है।
यह केवल गाँव की याद नहीं है।
यह उस घर की याद है जिसे पीछे छोड़ना पड़ा।
उन गलियों की याद है जहाँ लौटना आज भी एक सपना है।
उन पीढ़ियों की स्मृति है जिन्होंने अपने बुज़ुर्गों से उस मिट्टी की कहानियाँ सुनीं, जिसे उन्होंने शायद कभी देखा भी नहीं।
सुबह की सुनहरी धूप, नदी, बाग-बगीचे, गाँव की हलचल और पुरानी स्मृतियाँ—इन सबके बीच एक सवाल लगातार गूंजता है:
क्या अपनी मातृभूमि से दूर होने का दर्द कभी पूरी तरह खत्म होता है?
🎙️ INNAMAX Voice
Real Voices. Real Stories. Real Connection.
✍️ गीतकार: डॉ. राकेश दत्त मिश्र
यह गीत उन सभी लोगों की स्मृतियों और भावनाओं को समर्पित है, जिनके लिए “घर” केवल एक जगह नहीं, बल्कि उनकी पहचान और स्मृति का हिस्सा है।
अगर यह गीत आपके दिल को छुए, तो इसे उन लोगों तक ज़रूर पहुँचाइए जिनके लिए अपना गाँव आज भी एक अधूरी पुकार है।
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