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महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित l Mahishasur Mardini Stotram with Hindi Meaning and Lyrics

Vedic Sangeet (वैदिक संगीत)

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महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित l Mahishasur Mardini Stotram with Hindi Meaning and Lyrics

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Vedic Sangeet (वैदिक संगीत)
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#MahishasurMardiniStotram #AyiGiriNandiniNanditMedini #DurgaMaaStuti #MaaDurgaStuti #MaaDurgaPath #NavratriSpecialDurgaStuti #NavratriSpecialDurgaBhajan #DurgaMaaStuti #durgaMaaAarti #NavratriSpecial महिषासुर मर्द्नि स्तोत्रम #अयि #गिरिनन्दिनि #नन्दित #मेदिनि विश्व-विनोदिनि नंदि नुते गिरिवर विन्ध्य-शिरोऽधि-निवासिनि विष्णु-विलासिनि जिष्णुनुते | भगवति हे शितिकण्ठ- कुटुम्बिनि भूरि कुटुम्बिनि भूरि कृते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 1 || सुरवर-वर्षिणि दुर्धर-धर्षिणि दुर्मुख-मर्षिणि हर्षरते त्रिभुवन-पोषिणि शङ्कर-तोषिणि किल्बिष-मोषिणि घोषरते | दनुज-निरोषिणि दितिसुत-रोषिणि दुर्मद-शोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 2 || अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रिय-वासिनि हासरते शिखरि-शिरोमणि तुङग-हिमालय-शृङ्गनिजालय-मध्यगते | मधु मधुरे मधु-कैतभ-गञ्जिनि कैतभ-भञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 3 || अयि शतखण्ड-विखण्डित-रुण्ड-वितुण्डित-शुण्ड-गजाधिपते रिपु-गज-गण्ड-विदारण-चण्ड-पराक्रम-शुण्ड-मृगाधिपते | निज-भुजदण्ड-निपातित-चण्ड-विपातित-मुण्ड-भटाधिपते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 4 || अयि रणदुर्मद-शत्रु-वधोदित-दुर्धर-निर्जर-शक्ति-भृते चतुर-विचार-धुरीण-महाशिव -दूत-कृत-प्रमथाधिपते | दुरित-दुरीह-दुराशय-दुर्मति-दानव-दूत-कृतान्तमते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 5 || अयि शरणागत-वैरिवधूवर वीर वराभय-दायकरे त्रिभुवनमस्तक-शूल-विरोधि-शिरोधि-कृताऽमल-शूलकरे | दुमि-दुमि-तामर-दुन्दुभिनाद-महो-मुखरीकृत-दिङ्निकरे जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 6|| अयि निज हुङ्कृति मात्रनिराकृत-धूम्रविलोचन-धूम्रशते समरविशोषित-शोणितबीज-समुद्भव शोणित-बीजलते | शिव-शिव-शुम्भ निशुम्भ-महाहव-तर्पित-भूतपिशाच-रते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 7 || धनुरनु सङ्ग रणक्षणसङ्ग-परिस्फुर दङ्ग-नटत्कटके कनक-पिशङ्ग-पृषत्क-निषङ्ग-रसद्भट शृङ्ग-हताबटुके | कृत-चतुरङ्ग-बलक्षिति-रङ्ग-घटद्-बहुरङ्ग-रटद्-बटुके जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 8 || सुरलल नात तथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः कुकुथो गड दादिक ताल कुतूहल गानरते । धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि घोर मृदंग निनाद रते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 9 || जय-जय-जप्य-जये-जय-शब्द-परस्तुति-तत्पर-विश्वनुते झणझण-झिञ्झिमि-झिङ्कृत-नूपुर-शिञ्जित-मोहित भूतपते | नटित-नटार्ध-नटीनट-नायक-नाटित नाट् य सुगानरते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 10 || अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहर कान्तियुते श्रित रजनी रजनी रजनी रजनी-रजनीकर-वक्त्रवृते | सुनयन विभ्रमर भ्रमर-भ्रमर-भ्रमर भ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 11 || सहित-महाहव-मल्लम तल्लिक-मल्लित-रल्लक-मल्लरते विरचित वल्लिक-पल्लिक-मल्लिक-झिल्लिक-भिल्लिक-वर्गवृते | शितकृतफुल्ल समुल्लसिताऽरुण-तल्लज-पल्लव-सल्ललिते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 12 || अविरल गण्ड गलन्मद-मेदुर-मत्त मतङ्गज राजपते त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूप-पयोनिधि राजसुते | अयि सुद तीजन-लालस-मानस-मोहन-मन्मथ राजसुते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 13 || कमलदलामल-कोमल-कान्ति-कलाकलिताऽमल-भालतले सकल विलास कलानिलय क्रम केलिचलत्कल-हंस कुले | अलिकुल-सङ्कुल-कुवलय मण्डल-मौलिमिलद्-वकुलालिकुले जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 14 || कर-मुरली-रव-वीजित-कूजित-लज्जित-कोकिल-मञ्जुमते मिलित-पुलिन्द-मनोहर-गुञ्जित-रञ्जित-शैल निकुञ्जगते | निजगणभूत-महाशबरीगण-सद्गुण-सम्भृत-केलितले जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 15 || कटितट-पीत-दुकूल-विचित्र-मयूख-तिरस्कृत-चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर-मौलिमणिस्फुर दंशुल सन्नख चन्द्ररुचे जित-कनकाचल मौलिमदोर्जित- निर्भरकुञ्जर-कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 16 ॥ विजित-सहस्रकरैक-सहस्रकरैक-सहस्रकरैकनुते कृत-सुरतारक-सङ्गर-तारक सङ्गर-तारक सूनुसुते | सुरथ-समाधि-समान-समाधि-समाधिसमाधि-सुजात-रते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 17 || पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् | तव पदमेव परंपद-मित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 18 || कनकल सत्कल-सिन्धु जलैर नुषिञ्चति तॆगुण रङ्गभुवं भजति स किं न शचीकुचकुम्भ-तटीपरि-रम्भ-सुखानुभवं | तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवं जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 19 || तव विमलेऽन्दुकलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूत-पुरीन्दुमुखी-सुमुखीभिरसौ-विमुखीक्रियते | मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 20 || अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवि तव्य मुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासि रते | यदुचितमत्र भवत्युररी कुरुता-दुरुता पमपा-कुरुते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते || 21 || ll इति श्रीशंकराचार्य कृतम् महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ll