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सुदामा और उसके परिवार के लिए श्रीकृष्ण ने रचाई लीलाएं | Shri Krishna Jeevani

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सुदामा और उसके परिवार के लिए श्रीकृष्ण ने रचाई लीलाएं | Shri Krishna Jeevani

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श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका जा रहे सुदामा की सहायता करने के लिए स्वयं श्रीकृष्ण मुरली मनोहर का रुप धारण करके उसके साथ होकर चलने लगते है, लेकिन उनका बार-बार अपनी पत्नी लक्ष्मी का गुणगान करना सुदामा को अच्छा नहीं लगता है। नदी पार करके दोनों रात्रि विश्राम के लिए एक खण्डहर में रुकते है। जहाँ समय काटने के लिए मुरली मनोहर मुरली बजाने लगते है। उनकी मुरली की धुन सुन कर एक नागराज फन फैला कर उनके पास मंडराने लगता है। इस दृश्य से सुदामा को भयभीत होता देख मुरली मनोहर के अनुरोध पर नागराज वहाँ से चला जाता है। नागराज के जाने के बाद मुरली मनोहर अपनी भोजन की पोटली को खोलकर सुदामा को भोजन के लिए आमंत्रित करते है, जिसे सुदामा यह कह कर ठुकरा देते है कि यह आपकी पत्नी ने आपके लिए बनाया है, इसे आपको ही खाना चाहिए। सुदामा का हठ देख मुरली मनोहर भोजन की प्रशंसा करते हुए कहते है कि यदि मेरी पत्नी यहाँ होती तो वह आपको भोजन अवश्य कराती, क्योंकि वह भी आपकी तरह श्रीकृष्ण की भक्त है। श्रीकृष्ण का नाम सुन कर सुदामा जैसे ही भोजन का पहला ग्रास उठाते है, उन्हें अपने भूखे परिवार की याद आ जाती है और वह ग्रास पत्तल में वापस रख देते है। वास्तव में सुदामा का परिवार भूखा था और उसकी पत्नी वसुंधरा ने चक्रधर का द्वारा लाए गए भोजन यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि यह भोजन राजा का झूठा गुणगान करके कमाए गए धन से बना है। तभी गाँव में मुनादी होती है कि ठाकुर सांवले शाह ने अपने पौत्र के जन्म की खुशी में सभी ब्राह्मण परिवारों को दस दिनों तक तीनों समय का भोजन ओर मिष्ठान देने की घोषणा की है। यह मुनादी भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा के भूखे परिवार का पेट भरने के लिए अपनी लीला रचकर कराई थी। यह मुनादी सुनकर चक्रधर को भगवान की महिमा पर विश्वास होने लगता है। सांवले शाह के कर्मचारी एक भोजन का बड़ा टोकरा लेकर सुदामा की कुटिया में पहुंचते है तो वसुंधरा सोच में पड़ जाती है। चक्रधर उसे समझाता है कि यह भोजन त्रिलोकीनाथ की कृपा से आपके द्वार तक आया है। त्रिलोकीनाथ का नाम सुन वसुंधरा भोजन को ग्रहण करते हुए श्रीकृष्ण के भक्त वत्सल होने को सत्य कहती हैं, चक्रधर भी श्रीकृष्ण का जयकारा लगाता है। उधर खण्डहर में जब सुदामा को एक व्यक्ति से पता चलता है कि ठाकुर सांवले शाह ने पौत्र होने की खुशी में बटवाएं हुए भोजन से उसके चारों बच्चों भरपेट भोजन करके तृप्त हो चुके हैं, वह भी भोजन को लेने के लिए उस व्यक्ति के साथ चल देता है। उस व्यक्ति के साथ सुदामा को जाते देख मुरली मनोहर ताना मारने लगता है, जिससे सुदामा को अपनी गलती का आभास होता है और वह क्षमा माँग कर मुरली मनोहर के साथ भोजन करने लगता है। श्रीकृष्ण के लीलाएं देखकर रुक्मिणी उनकी प्रशंसा करने लगती है। श्रीकृष्ण रुक्मिणी से कहते हैं कि मेरा मित्र सुदामा काफी स्वाभिमानी है, इसलिए उसके स्वाभिमान की लाज रखने के लिये मुझे यह सब करना पड़ा। मैंने कई अवतार लिए हैं किन्तु यह ऐसा पहला अवतार है जब मुझे दो-दो मित्र मिले हैं, एक अर्जुन, दूसरा सुदामा। इसलिए मैं इन दोनों के साथ मित्रता के ऐसे आदर्श निभाना चाहता हूँ जो युगों-युगों तक मानव को प्रेरित करें। रात्रि विश्राम के लिए जहाँ मुरली मनोहर बिछौना तैयार करके सुदामा को उस पर विश्राम करने का अनुरोध करते है। परंतु निर्धन सुदामा को तो धरती पर लेटने की आदत थी, इसलिए वह मुरली मनोहर के आग्रह को बार-बार ठुकराने लगता है। तब मुरली मनोहर अपनी वाक-पटुता का प्रयोग करते हुए सुदामा को उस बिछौने पर सोने के लिए विवश कर देते है। रात में जहाँ मुरली मनोहर अपनी पत्नी के प्रेम में गीत और बांसुरी बजाते हैं। तो वही सुदामा उन्हें ईश्वर को याद करने की सुझाव देते हैं। तब मुरली मनोहर कहते हैं कि यदि परमात्मा प्रेम है, तो प्रेम भी परमात्मा है। प्रेम और भक्ति पर दोनों के बीच गहन चर्चा होती है। अंत में सुदामा उनकी बातों से प्रभावित होकर शांत मन से विश्राम करने चले जाते हैं। सम्पूर्ण जगत में भगवान विष्णु के आठवें अवतार एवं सोलह कलाओं के स्वामी भगवान श्री कृष्ण काजीवन धर्म, भक्ति, प्रेम, और नीति का अद्भुत संगम है। वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कारागार में जन्म लेकर गोकुल की गलियों में यशोदा और नंदबाबा के यहाँ पलने वाले, अपनी लीलाओं, जैसे पूतना वध, माखन चोरी, राधा के संग प्रेम, गोपियों के साथ रासलीला और कालिया नाग के दमन के लिए प्रसिद्ध श्री कृष्ण ने युवावस्था में मथुरा कंस का वध करके जनमानस को उसके अत्याचार से मुक्त कराया एवं स्वयं के लिए द्वारका नगरी स्थापना भी की। उनका जीवन केवल लीलाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज को धर्म और कर्म का गूढ़ संदेश देने के लिए महाभारत के युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन किया और अर्जुन के सारथी बनकर उसे "श्रीमद्भगवद्गीता" का उपदेश दिया, जो आज भी जीवन की समस्याओं का समाधान बताने वाला महान ग्रंथ माना जाता है। श्री कृष्ण का जीवन प्रेम, त्याग, और नीति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आपका प्रिय चैनल "तिलक" श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ा यह विशेष संस्करण "श्री कृष्ण जीवनी" आपके समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी कथाओं का संकलन किया गया है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए। #tilak #krishna #shreekrishna #shreekrishnajeevani #krishnakatha