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क्यों नहीं फहराया जाता कामाख्या मंदिर पर झंडा? ध्वज के स्थान पर है कामाख्या का गुप्त विधान?|

Tilak Patrika

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क्यों नहीं फहराया जाता कामाख्या मंदिर पर झंडा? ध्वज के स्थान पर है कामाख्या का गुप्त विधान?|

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तिलक पत्रिका" एक अनूठा समाचार चैनल जो 24x7 प्रस्तुत करता है भारत के धार्मिक स्थलों की खबरें व अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां। इस चैनल के माध्यम से आप जुड़ते हैं भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के साथ। यहां आप हर दिन हर क्षण देख सकते हैं भारतीय मंदिरों और तीर्थ स्थलों की नवीनतम और महत्वपूर्ण खबरें। यह चैनल आपको समाचारों के साथ-साथ भारतीय धार्मिक स्थलों के आलौकिक दर्शन का अद्वितीय अनुभव भी प्रदान करता है, जिससे आप ईश्वर की विभिन्न महिमाओं के बारे में भी जानते हैं। "तिलक पत्रिका" में प्रस्तुत होने वाली हर खबर से जुड़ा है उस धार्मिक स्थल का इतिहास, महत्व और मान्यताएं, जिससे आप उस स्थल की अद्भुतता को भी समझते है। साथ ही यहां आप देखते हैं लाइव पूजा, आराधना और धार्मिक आयोजनों की विवरणात्मक रिपोर्टिंग भी...तो धर्मस्थलों की समस्त जानकारियां व नवीनतम समाचार लाइव एवं वीडियो के माध्यम से सबसे पहले देखने के लिए आज ही जुड़़िये "तिलक पत्रिका" के साथ! संसार के सभी 51 शक्तिपीठों की अपनी अनूठी और दिव्य महिमा है, किंतु इनमें असम स्थित माँ कामाख्या धाम को समस्त शक्तिपीठों में सर्वोपरि माना गया है। सामान्यतः आपने हर मंदिर के शिखर पर लहराता हुआ ध्वज देखा होगा, परंतु विश्व प्रसिद्ध माँ कामाख्या मंदिर में कभी भी कोई ध्वज नहीं फहराया जाता है। सनातन मान्यताओं के अनुसार, इस पावन पीठ को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है क्योंकि यहीं भगवती की महायोनि स्थापित है, जिसे समूची सृष्टि का संचार और उत्पत्ति केंद्र माना गया है। माँ कामाख्या पीठ तंत्र साधना और वाममार्गी पूजा पद्धति का मुख्य गढ़ है। सामान्य मंदिरों में ध्वज विजय का प्रतीक होता है, परंतु कामाख्या पीठ में माँ भगवती स्वयं सर्वशक्तिमान प्रतीक हैं; यहाँ मंदिर का प्राचीन गुंबद ही ध्वज के स्वरूप को समाहित करता है। वर्ष में केवल एक बार विशेष तांत्रिक विधि से गुप्त रूप से ध्वज का पूजन किया जाता है, जिसे अंबुवाची पर्व के समय बदला जाता है। शास्त्रों के अनुसार देवी पीठों में ध्वज के स्थान पर त्रिशूल व कलश स्थापित किए जाते हैं, जहाँ त्रिशूल एक शक्तिशाली तड़ित चालक की भांति कार्य करते हुए आकाशीय बिजली से मंदिर के मुख्य ढांचे की रक्षा करता है तथा महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की त्रि-शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर के आसपास का क्षेत्र चौबीस घंटे एक प्रचंड चुंबकीय और दिव्य तरंग से सराबोर रहता है। सनातन परंपरा का प्रत्येक नियम केवल आस्था नहीं बल्कि गहरा विज्ञान समेटे हुए है। तिलक पत्रिका के लिए गुवाहाटी (असम) से संवाददाता आशु शर्मा की यह विशेष रिपोर्ट। #KamakhyaTemple #ShaktipeethSecrets #TantraSadhana #SanatanVigyan #GuwahatiAssam