नहीं कुछ भी मुझे करना | Nahi Kuch Bhi Mujhe Karna | उत्तम तप | दशलक्षण महापर्व भजन | आत्मन धर्म सौरभ
Baal Br. Pt. Sumat Prakash Ji
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नहीं कुछ भी मुझे करना | Nahi Kuch Bhi Mujhe Karna | उत्तम तप | दशलक्षण महापर्व भजन | आत्मन धर्म सौरभ
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नहीं कुछ भी मुझे करना, सहज निष्काम ज्ञायक हूँ॥ टेक ॥
नहीं सुनना-सुनाना कुछ, नहीं पढ़ना-पढ़ाना कुछ ।
नहीं लखना-लखाना कुछ, सदा निष्काम चेतन हूँ ॥1॥
नहीं लेना-नहीं देना, नहीं करना-कराना कुछ ।
नहीं चिन्ता-नहीं चिन्तन, सदा निष्क्रिय चेतन हूँ ॥2॥
स्वयं में पूर्ण पारिणामिक, नहीं कुछ भी कमी दीखे ।
अपेक्षा कुछ नहीं पर से, सहज सुखकन्द चेतन हूँ ॥3॥
नहीं निंदा से कुछ हानि, लाभ कुछ ना प्रशंसा से ।
नहीं हानि-नहीं वृद्धि, अगुरुलघु रूप चेतन हूँ ॥4॥
नहीं अच्छा-बुरा कोई, नहीं रिपु-मित्र भी कोई ।
सदा पर से रहूँ न्यारा, स्वयं में पूर्ण चेतन हूँ ॥5॥
नहीं स्वामी कोई मेरा, किसी का मैं भी नहीं स्वामी ।
नहीं कर्त्ता, नहीं भोक्ता, सहज ही तृप्त चेतन हूँ ॥6॥
द्रव्य षट् तत्त्व नौ न्यारे, भाव पाँचों सदा न्यारे ।
नहीं उत्पाद-व्यय मुझमें, प्रभु ध्रुव रूप चेतन हूँ ॥7॥
नहीं आधि नहीं व्याधि, उपाधि कुछ नहीं मुझमें ।
अहो! शाश्वत समाधिमय, निरंजन नित्य चेतन हूँ ॥8॥
नहीं जाना मुझे तीरथ, तीर्थ शुद्धात्मा मैं हूँ ।
किसे पूजूँ, किसे ध्याऊँ, सहज ही पूज्य चेतन हूँ ॥9॥
नहीं व्रत शील तप संयम, समिति गुप्ति औ दशलक्षण ।
नहीं रत्नत्रय चाहूँ, प्रभु परिपूर्ण चेतन हूँ ॥10॥
नहीं अब धर्म करना है, धर्म मुझसे सहज प्रगटे ।
अहो! चिन्मय परमधर्मी, धर्म की खान चेतन हूँ ॥11॥
नहीं संसार हरना है, नहीं मुक्ति को करना है ।
नहीं श्रद्धा, नहीं ध्यान, ध्येय श्रद्धेय चेतन हूँ ॥12॥
अरे! करना तो मरना है, अनादर प्रभु का है इसमें ।
दिखे अन्तर में प्रभु मेरा, स्वयं सिद्ध रूप चेतन हूँ ॥13॥
(सहजपाठ संग्रह पृ. 34)
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रचयिता - श्रद्धेय ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्वर - वंदना पारख, राजनांदगाँव
सहस्वर - अध्यात्म परिवार, राजनांदगाँव
संगीत - विलास स्टूडियो, राजनांदगाँव
प्रस्तुतकर्ता - आत्मन् परिवार, सम्मेदशिखरजी