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#18 एक सरूप भगवन्त को, मन अन्तर सदा चितार।‘मंगत’ दुस्तर जगत से, तब जन उतरे पा

Samta Vani Sangat Samtavad

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#18 एक सरूप भगवन्त को, मन अन्तर सदा चितार।‘मंगत’ दुस्तर जगत से, तब जन उतरे पा

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Samta Vani Sangat Samtavad
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ॐ ब्रह्म सत्यम् सर्वाधार, ग्रन्थ: श्री समता प्रकाश नित ही मन में करो विचार। साचा नाम परम सुखसार॥ उठत बैठत नाम ध्याओ। प्रभ अपने को सीस निवाओ॥ आज्ञा में देखो सब किरया। सतसरूप सकल पसरया॥ साची नीती नित उठ घाल। साचा शबद अमीरस भाल॥ जनम मरन की विरत त्याग। निरमल शबद का गाओ राग॥ शबद अबनाशी शबद निर्वांना। घट घट अन्तर शबद समाना॥ अबगत पुरख अनादी देव। निर्मल चित से परसो सेव॥ ज्यों ज्यों शबद सार को ध्याई। मनमुख भरम जीव का जाई॥ दुर्मत नास सम्मत परकाशी। हिरदे चेत केवल अबनाशी॥ मिथ्या देह की ममता जाए। सतसरूप शबद घर पाए॥ कभू ना भूलो साचा नाम। सिमर सिमर पावें बिसराम॥ सार ज्ञान ये ही है मीत। सरजनहार को राखो चीत॥ माया चक्कर अत घना कलेशा। बिना विवेक नहीं मिटे संदेशा॥ सत विवेक हिरदे में धार। चेतन सरूप सिमर निरंकार॥ निर्मल चित से नाम कमाओ। सतगुर सीख सतधाम समाओ॥ जग आवन ये भेद विचार। नाम प्रभू में प्रीती धार॥ करता हरता ठाकर चेत। आज्ञा मान सब मिटे विक्षेप॥ भरम फुलवाड़ी जगत की रचना। काल कल्पना सकल ये सपना॥ नाम पदारथ हिरदे चाख। जाए व्याधी दुर्मत साख॥