The Journey from ‘Coolie’ to Elite । ‘कुली’ से कुलीन बनने की सफ़र । दीप्ति अग्रवाल
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The Journey from ‘Coolie’ to Elite | ‘कुली’ से कुलीन बनने का सफ़र | दीप्ति अग्रवाल
‘कुली’—औपनिवेशिक इतिहास में यह केवल एक शब्द नहीं था, बल्कि भारतीय श्रमिकों पर आरोपित एक ऐसी पहचान थी, जिसमें श्रम, नस्लीय भेदभाव, सामाजिक पदानुक्रम और औपनिवेशिक सत्ता-संबंधों की पूरी संरचना छिपी हुई थी। लेकिन समय के साथ यही प्रवासी भारतीय समुदाय संघर्ष, शिक्षा, आर्थिक उन्नति और सामाजिक गतिशीलता के माध्यम से नई पहचान गढ़ता गया।
“The Journey from ‘Coolie’ to Elite” विषय पर इस व्याख्यान में दीप्ति अग्रवाल भारतीय प्रवासी समुदाय की इसी ऐतिहासिक यात्रा को रेखांकित करती हैं—एक ऐसी यात्रा, जिसमें गिरमिटिया और औपनिवेशिक श्रमिक अनुभवों से आगे बढ़ते हुए नई सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान का निर्माण दिखाई देता है।
यह चर्चा कई महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है—‘कुली’ शब्द की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या थी? औपनिवेशिक समाजों में भारतीय श्रमिकों की सामाजिक स्थिति कैसी थी? प्रवासी समुदायों ने आर्थिक और शैक्षिक प्रगति के माध्यम से अपनी स्थिति कैसे बदली? और क्या सामाजिक उन्नति के बाद भी औपनिवेशिक अतीत की स्मृतियाँ उनकी सामूहिक पहचान में बनी रहीं?
यह व्याख्यान केवल सामाजिक गतिशीलता की कहानी नहीं, बल्कि पहचान, गरिमा, श्रम, प्रवासन, स्मृति और प्रवासी भारतीय समुदायों के आत्मनिर्माण की एक व्यापक ऐतिहासिक यात्रा को समझने का प्रयास है।
अगर आप गिरमिटिया इतिहास, भारतीय श्रम प्रवासन, भारतीय डायस्पोरा, औपनिवेशिक इतिहास और प्रवासी समुदायों की सांस्कृतिक स्मृतियों में रुचि रखते हैं, तो यह वीडियो आपके लिए विशेष रूप से उपयोगी होगा।
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