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मोहन राकेश की डायरी- शचीन्द्र आर्य

Studio Shachinder

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मोहन राकेश की डायरी- शचीन्द्र आर्य

59 просмотров · 7 дн. назад
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07.12.2013/ मोहन राकेश की डायरी कुछ ऐसी जगहें होती हैं, जहाँ हम ख़ुद होते हैं । अपने आप में बिल्कुल नंगे । बिल्कुल अकेले । बेपरदा । बेपरवाह । लिखने के पहले, लिखने के बाद, हम कुछ-कुछ बदल रहे होते हैं । शायद ख़ुद को । जो चाहकर भी किसी से नहीं कह पाये । रुक गए उन्हें सबकी नज़रों में लाने से पहले । डायरी के पन्ने हम अपने तक छिपाये रखते हैं । किसी से कहने नहीं जाते । चुपचाप सब सहन करते जाते हैं । उन कही बातों को जज़्ब करते रहते हैं । पिछले हफ़्ते ‘मोहन राकेश की डायरी’ मिली । न जाने कब से इसे पढ़ने की इच्छा थी । सोचता था कहीं एक बार फिर दिख जाये । फिर जाने नहीं दूंगा । एक लेखक अपनी ज़िन्दगी लिख रहा है । जो सिर्फ़ उसने जी । किसी से न कह सकने की हद तक । अपने अकेलेपन को भर लेने की तरह । बार-बार उन्हें लगता, नहीं लिख पा रहा हूँ । एकबार वह फिर लौटते । यह डायरी उन्नीस सालों के दरमियान कई बार टूटती है । फिर जुड़ती है । न लिख पाने की टीस बार-बार मवाद की तरह यहाँ हर पन्ने पर मौजूद है । दर्द है । पीड़ा है । अकेले बीतते दिनों, शामों, रातों की ख़ामोश आवाज़ें हैं । यह आवाज़ें दीवारों से लौट कर बराबर वापस आती रहीं । उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है । आहिस्ते से पन्ने खोल कभी शाम ढले पन्ने पढ़ने लग जाता हूँ । कहीं से भी शुरू कर देने की आदत । यह बेतरतीब होना नहीं है । फिर भी ऐसे ही कहीं रुक जाता हूँ । ठहर सोचने लगता हूँ । वह ख़ालीपन कितना तोड़ रहा था । ख़ुद अपनी तरफ़ लौटता हूँ तो लगता है, यह सब लिखा, ‘डायरी’ में नहीं समाता । कोई और ज़िंदगी नहीं हो सकती थी उनके हिस्से? कैसे होते गए होंगे हाथ । दिल कितना रोया होगा । सोचता, ऐसा ही क्यों लिखा उन्होंने । अभी तक कुछ जादा नहीं पढ़ पाया । जितने पन्ने पढ़ पाया, उनमें वह अभी दिल्ली नहीं आए हैं । जालंधर ही हैं । कॉलेज की उबाऊ ज़िन्दगी से भाग लेने का मन कर रहा है । माँ साथ ही रह रही हैं । उनके पैरों में दर्द बना रहता है । कभी उनसे ही झगड़ लेते हैं । उन्हें छोटी-छोटी बात पर रुला देते हैं । नौकरी छोड़ने का मन बना रहे हैं । बीयर पीकर सुबहें सरदर्द के साथ शुरू होती हैं । इन्हें फिर न छूने की कसमें शाम होते-होते कई बार टूटती रही हैं । ख़ूब घूमते हैं । पैदल । रिक्शे पर । अनमने । ख़ाली सड़कों पर । भरी सड़कों पर । एक रात पढ़ते-पढ़ते जहाँ पहुँचा, वहाँ एक जून उन्नीस सौ सत्तावन की एक एंट्री है । रात ज़ोर की आँधी आई । नींद टूट गयी । वह बता रहे हैं, ऐसे ही किसी शाम बक्शी से बात हो रही है । दोनों तुलनात्मक अध्ययन के मूड में हैं । उसने कोई किस्सा सुनाया है । जिसमें वह छह साल पहले अपने लिए किसी ‘द वूमेन’ कह सकने वाली दिल्ली की लड़की की बात कर रहा है । किस्सा मुख्तसिर यह हुआ के उसने पुरखों की परम्परा के अनुरूप आर्थिक सुरक्षा के अभाव में किसी और लड़के से शादी कर ली । पाल अक्सर इसी ‘द वुमन’ के मसले पर भाषण दिया करता था । मोहन राकेश तब लिखते हैं: “मैं उससे कह रहा था कि ऐसे वातावरण में मुझे किसी के अभाव का बहुत अनुभव होता है । पुरुष-पुरुष में बहुत घनिष्ठता हो जाती है लेकिन वास्तविक घनिष्ठता एक पुरुष और एक स्त्री में ही संभव है क्योंकि इमोशन की सही परिणति शारीरिक उपलब्धि में ही जाकर होती है । The climax of true intimacy is the complete merger of two bodies. Intimacy is incomplete without that merger and the merger is incomplete without that intimacy. इसलिए पुरुष को स्त्री का साहचर्य मात्र ही नहीं चाहिए- हर पुरुष को एक विशेष स्त्री का साहचर्य ही वास्तविक सुख दे सकता है । It is a question not of a woman but the woman”. मुझे लगता है, हम सब उम्र के किसी न किसी पड़ाव पर ऐसे हो जाते हैं । कल तुम हो रहे थे । आज हम हो रहे हैं । आगे यह किस तरह घटित होगा, आज, इसी पल कहा नहीं जा सकता ।