शर्मा कौन होते हैं ? Sharma kon hote hai ? #sharma #brahman #cast #jaati #hindu #hinduism #trending
शास्त्र उल्लेख
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नमस्कार मित्रों! मेरे मन में अनेक प्रश्न थे जैसे ब्राह्मण किसे कहते? जब वर्ण-व्यवस्था हुई तो ब्राह्मण ने नाम के अंत में क्या लिखा होगा? आखिर शर्मा शब्दकोष में आया कहां से? वास्तव में कौन लिख सकता है शर्मा सरनेम? ब्राह्मण समाज का क्या संबंध है शर्मा शब्द से ? शर्मा यदि ब्राह्मण है तो गोत्र क्या है? यदि कोई ब्राह्मण पुत्र अपना सरनेम शर्मा बताए तो लोग मन से ब्राह्मण क्यों स्वीकार नहीं करते? शर्मा ब्राह्मण का भाट जाति से क्या संबंध? आखिरकार वास्तविकता क्या है? इस प्रकार के प्रश्न मेरे मन में उमड़ रहे थे जिनके उत्तर जानने की जिज्ञासा ने मुझे अनेक शस्त्रों का अध्ययन का इच्छुक बनाया और उत्तर भी मिले तो आइए जानते हैं पं. विनायक के द्वारा शास्त्र उल्लेख चैनल के माध्यम से और मेरा आपसे विनम्रतापूर्वक निवेदन है विडिओ को अंत तक सुने अभी समय का अभाव हो तो बाद में सुने क्योंकि बहुत मेहनत के बाद यहां तक पहुंचा हूं। मुझे सस्क्राइव का कोई मोह नहीं है अगर विडिओ पंसद आये तो सस्क्राइव कर दो अपका ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूं। अन्यथा मेरा आपसे केवल इतना अनुरोध है विडिओ को अंत तक सुने तो आइए जानते है आखिर ब्राह्मण किसे कहते है? मैं इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले बोलना चाहूँगा कि आज की पड़ी लिखी होनहार पीड़ि मेरी इस विडिओ को लेकर अवश्य सोचेंगे की दुनिया चांद पर पहुंच गई और पंडित जी अभी भी वर्ण-व्यवस्था और जातिवाद पर अटके हुए हैं। लेकिन में आपको अवगत करा दूं कि भारत में आज भी जातीय आधार पर राज्य के मुख्य मंत्री और विधायक बनते हैं । मेरी इस बात का अपने मन में मंथन करके राजनीति पर दृष्टि डाल कर ही फिर कमेंट करें। और में जातिवाद नहीं कर रहा हूं इस विडिओ का सिर्फ उद्देश्य शर्मा ब्राह्मण पर प्रश्न चिह्न है और यह प्रश्न चिह्न चर्चा का विषय बना है इसलिए जो शास्त्रों से मेनें स्वयं अध्ययन किया उसे प्रस्तुत कर रहा हूँ।
तो आइए चलिए जानते ब्राह्मण आखिर कहते किसे हैं?
यास्क मुनि के अनुसार स्कन्द पुराण (नागरखण्ड) में लिखा है कि- जन्म ना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते ।
अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।
महर्षि मनु महाराज मनुस्मृति में लिखते है
विधाता शासिता वक्ता मो ब्राह्मण उच्यते।
तस्मै ना कुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिर मीरयेत्॥
अर्थात-शास्त्रो का रचयिता तथा सत्कर्मों का अनुष्ठान करने वाला, शिष्यादि की ताडनकर्ता, वेदादि का वक्ता और सर्व प्राणियों की हितकामना करने वाला ब्राह्मण कहलाता है। अतः उसके लिए गाली-गलौज या डाँट-डपट के शब्दों का प्रयोग उचित नहीं"
अब मेरे मन में प्रश्न थे कि जब वर्ण-व्यवस्था हुई तो ब्राह्मण ने नाम के अंत में क्या लिखा होगा? आखिर शर्मा शब्दकोष में आया कहां से? वास्तव में कौन लिख सकता है शर्मा सरनेम? ब्राह्मण समाज का क्या संबंध है शर्मा शब्द से ?
तो इन सब बातों का उत्तर खोजने के लिए सबसे पहले मेनें श्रीविष्णुपुराण का अध्ययन किया (श्री विष्णु पुराणे तृतीये ऽशे दशमो ऽध्यायः ॥) अर्थात श्री विष्णु पुराण के तीसरे भाग के दसवें अध्याय में लिखा है
शर्मेति ब्राह्मणस् योक्त वर्मेति क्षत्रसं श्रयम् ।
गुप्त दासात्मकं नाम प्रशस् तं वैश्य शूद्रयोः ॥९॥
अर्थात्- ब्राह्मणके नामके अन्तमें शर्मा, क्षत्रियके अन्तमें वर्मा तथा वैश्य और शुद्रोंके नामान्तमें क्रमशः गुप्त और दास शब्दोंका प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ ॥
इसी बात की पुष्टि करते हुए महर्षि मनु महाराज मनुस्मृति में द्वितीय अध्याय श्लोक 32 लिखते हैं
शर्म वद् ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षा समन्वितम्।
वैश्यस्य पुष्टि संयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्य संयुतम् ।। (मनुस्मृतिः २/३२)
अर्थात्- ब्राह्मण का शर्मा शब्द से युक्त, क्षत्रिय का रक्षा शब्द से युक्त, वैश्य का पुष्टि शब्द से युक्त और शूद्र का 'दास' शब्द से युक्त उपनाम रखना चाहिए।शर्म वद् ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षा समन्वितम्।
वैश्यस्य पुष्टि संयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्य संयुतम् ।। (मनुस्मृतिः २/३२)
अर्थात्- ब्राह्मण का शर्मा शब्द से युक्त, क्षत्रिय का रक्षा शब्द से युक्त, वैश्य का पुष्टि शब्द से युक्त और शूद्र का 'दास' शब्द से युक्त उपनाम रखना चाहिए।
इसी बात को बौधायन गृह्य सूत्रम् गृह्य शेषः प्रथम प्रश्ने एका दशो ऽध्यायः। अर्थात् 11 अध्याय में लिखा गया है
शर्मान् तं ब्राह्मणस्य वर्मान् तं क्षत्रियस्य गुप्तान् तं।
वैश्यस्य भृत्य दासान् तं शूद्रस्य दासान्त मेव वा ।९।
जिसका भावार्थ इस प्रकार से है ब्राह्मण के नाम का शर्मा से अन्त, क्षत्रिय नाम का वर्मा से अन्त, वैश्य के नाम का गुप्त से अन्त, शूद्र अथवा सेवक के नाम का दास से अन्त हो!
अब प्रश्न मेरे मन मे यह उठता है कि यह मेनें अध्ययन किया और इसके अतिरिक्त भी शिव पुराण, भविष्य पुराण आदि में भी वर्णन है इस बात का परन्तु सबके लिए यह खोज पाना संभव नहीं तो में सही हूं या गलत इसके लिए एक पुस्तक है जो लगभग सभी के घरों में होती हैं जो गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित है नित्यकर्म-पूजाप्रकाश जिसके पृष्ठ क्र.36 है और पॉइंट नं 4 में स्पष्ट किया गया है की ब्राह्मण संकल्प के दौरान अपने नामके अन्तमें शर्मा, क्षत्रिय अपने नाम के अन्त में वर्मा और वैश्य अपने नाम के अन्त में गुप्त रिक्त स्थान में जोड़ दे।
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