रावण रचित शिव ताण्डव, अब हिन्दी चौपाई में | Shiv Tandav Hindi Lyrics।वीर,रौद्र रस ।
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रावण रचित शिव ताण्डव, अब हिन्दी चौपाई में | Shiv Tandav Hindi Lyrics।वीर,रौद्र रस ।
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कैलाश, जो शिवजी का निवास है। और रावण, जो उनका परम भक्त था। विद्वान, वेदों का ज्ञाता, संगीत का साधक। और उसका बल भी शिवजी की भक्ति से ही मिला था। पर रावण को अहंकार था।
उसने कुबेर की नगरी अलका को जीत लिया, और उनका पुष्पक विमान छीन लिया। विजय के नशे में उसे लगने लगा कि अब तीनों लोकों में उसके बल की बराबरी कोई नहीं कर सकता।
कथा कहती है, लौटते समय कैलाश के ऊपर पहुँचते ही पुष्पक विमान अचानक रुककर नीचे गिर पड़ा, और रावण भी धरती पर आ गिरा। द्वार पर खड़े नंदी जी ने उसे इस दशा में देखा तो हँस पड़े। उन्होंने कहा कि यहाँ शिव और पार्वती विराजमान हैं, आगे जाने की अनुमति नहीं है।
यह सुनकर रावण क्रोध से भर उठा। उसने नंदी जी का तिरस्कार करते हुए कहा, तुम पशु समान ही रहोगे, और वानर जैसे मत बनो। तब नंदी जी ने श्राप दिया, कि तेरे नाश का कारण वानर ही बनेंगे।
तुलसीदासजी लिखते हैं, "कौतुक ही कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाय। मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला अमित सुख पाय।" अर्थात, मानो अपने ही बाहुबल को तौलने के लिए उसने कैलाश को खेल-खेल में उठा लिया। कहा जाता है, वह कैलाश को लंका ले जाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता था।
उसने बीसों भुजाएँ पर्वत के नीचे डालीं और पूरी शक्ति से ज़ोर लगाया। कैलाश डोल उठा, और माता पार्वती भयभीत हो उठीं।
तब शिवजी ने बिना किसी क्रोध के, केवल अपने दाएँ पैर के अँगूठे के अग्रभाग को हल्का-सा दबा दिया।
गन्धर्वराज पुष्पदंत शिव महिम्न स्तोत्र में लिखते हैं, हे प्रभु, जिस बल पर रावण को घमंड था, वह आपकी ही भक्ति से मिला था। पर अहंकार में उसने आपके ही निवास पर ज़ोर आज़माया, और आपके अँगूठे के एक दबाव से उसे पाताल में भी ठिकाना न मिला।
कैलाश भारी हो गया। रावण के दोनों हाथ पर्वत के नीचे दब गए। वह चीखा, पर निकल न सका। उसकी पीड़ा की चीख से तीनों लोक काँप उठे, और इसी कारण उसका नाम रावण पड़ा।
उसी क्षण, रावण का अहंकार चूर-चूर हो गया।
जहाँ बल हार गया, वहाँ भक्ति जागी। रावण ने आँखें बंद कीं और शिवजी की स्तुति गाने लगा। परंपरा के अनुसार वह बहुत लंबे समय तक गाता रहा, और उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे मुक्त कर दिया। वही स्तुति आज शिव ताण्डव स्तोत्र के नाम से जानी जाती है।
यह स्तुति मूल रूप में संस्कृत भाषा में है। उसी संस्कृत स्तुति का हिन्दी में, मात्रा के नियम के अनुसार, लयबद्ध चौपाई रूप अब आपके सामने प्रस्तुत है।
🙏 पूरे बोल:
जटा जूट से बहती धारा
पावन भूमि करे जग सारा
गले नाग डमरू धुन छाए
ताण्डव शिव मंगल बरसाए
गंगा लहर जटा में सोहे
भाल अनल धक धक धक मोहे
बाल चन्द्र शिर शोभा प्यारी
उन शिव में हो प्रीति हमारी
गिरिजा संग विलास रचाएँ
दिशा दिशा में हर्ष समाएँ
कृपा दृष्टि से संकट टारें
मन दिगम्बर में नित विहारें
जटा नाग की मणि छवि भारी
दिशा वधू मुख कुंकुम धारी
मद गज चर्म ओढ़नी सोहे
भूतनाथ में मन अति मोहे
सुरपति सुमन धूल से धूसर
चरण पीठ शोभित शिव सुन्दर
नागराज की माल सजाए
चन्द्रशेखर चिर सुख दिलाएँ
काम भस्म जिन भाल अनल से
सुरपति नमें जिसे पल पल से
चन्द्र कला से भाल सुहाए
जटाजूट शिव सम्पद दाएँ
भाल आग जब धधकी भारी
स्वाहा हुए पञ्चशर धारी
गिरिजा उर पर चित्र रचाए
तीन नेत्र में प्रीति लगाए
घन घटा सी अमा अँधियारी
नील कण्ठ जिनका मनहारी
गंगाधर गजचर्म सुहाएँ
जग आधार सदा श्री लाएँ
नील कमल सी कान्ति लुभाए
श्याम कण्ठ जिनका अति भाए
स्मर त्रिपुर भव मख गज हारी
अन्धक यम हर भजूँ पुरारी
कला कली का रस मधु धारा
मधुप रूप में शिव ही प्यारा
स्मर पुर भव मख गज संहारी
अन्धक यम हर मैं बलिहारी
जय शिव भाल अनल विकराला
फुफकारे भुजंग की माला
धिमिद धिमिद मृदंग धुन छाए
ताण्डव करते शिव मन भाए
पत्थर हो या सेज बिछौना
सर्प हो या मोती सलोना
मित्र अरि रंक राजा समान
मैं कब भजूँ सदाशिव महान
गंगा तट की कुंज गुफा में
त्याग कुमति कब रहूँ मगन मैं
अंजलि शीश नयन थिर लाऊँ
शिव शिव जप कब सुखी कहाऊँ
जो नर पढ़े स्तोत्र यह गाए
शुद्धि सदा वह मन में पाए
शिव गुरु भक्ति शीघ्र पा जाता
शंकर चिन्तन मोह मिटाता
प्रदोष पूजा अन्त सुहाए
स्तोत्र दशमुख गीत जो गाए
रथ गज अश्व युत थिर सम्पदा
शम्भु देते उसको सर्वदा
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