नर्मदा परिक्रमावासी और साधु-संत अपनी यात्रा को रोक कब किस समय जाने क्यों #नर्मदा #परिक्रमा #आश्रम
मां नर्मदा परिक्रमा रवि
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नर्मदा परिक्रमावासी और साधु-संत अपनी यात्रा को रोक कब किस समय जाने क्यों #नर्मदा #परिक्रमा #आश्रम
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मां नर्मदा परिक्रमा रवि
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नर्मदा परिक्रमा के दौरान चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों और परिक्रमा के परंपरा अनुसार चातुर्मास के 4 महीनों में नर्मदा परिक्रमा को रोक दिया जाता है (इसे 'परिक्रमा विश्राम' कहते हैं)।
1. चातुर्मास में नियम और परंपरा
परिक्रमा का ठहराव: चातुर्मास के दौरान परिक्रमावासी किसी एक ही आश्रम, मंदिर या नर्मदा तट पर रुककर साधना और जप करते हैं। इस अवधि में आगे पैदल चलना या यात्रा जारी रखना वर्जित माना जाता है।
रोकने का मुख्य कारण: वर्षा ऋतु के कारण नदियों-नालों में उफान, मार्ग में जलभराव, जीव-जंतुओं (किट-पतंगों) की उत्पत्ति और उनके अनजाने में पैर के नीचे दबने से अहिंसा के नियम का पालन करने हेतु यह व्यवस्था बनाई गई है।
साधना और नियम: इस अवधि में परिक्रमावासी प्रतिदिन नर्मदा स्नान, पूजन, जप, ग्रंथ पठन और सात्विक आहार का पालन करते हैं।
2. चातुर्मास स्थल के चयन हेतु सुझाव
चातुर्मास हेतु ऐसे स्थान का चयन किया सुविधाएँ और साधना का वातावरण उपलब्ध हो:
ओंकारेश्वर / ममलेश्वर
अमरकंटक (नर्मदा उद्गम)
महेश्वर या मंडलेश्वर
गरुड़ेश्वर / तिलकेश्वर
होशंगाबाद (नर्मदापुरम) या सेठानी घाट
3. चातुर्मास समापन
कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) के दिन चातुर्मास का व्रत पूर्ण होता है।
इसके बाद नर्मदा जी का पूजन-अर्चन कर और साधु-संतों का आशीर्वाद लेकर परिक्रमावासी पुनः अपनी पैदल यात्रा आरंभ करते हैं।
यदि आप इस वर्ष चातुर्मास हेतु किसी विशिष्ट आश्रम/स्थान की जानकारी, चाहिए तो नर्मदा परिक्रमा रवि यू ट्यूब चनेल से सम्पर्क करें