भगवत्प्रेम कैसे मिलता है? | त्याग, समर्पण और प्रेम | सत्संग के बिखरे मोती | माला 3| मनका 73-108 |
Bhaav Bhakti Official
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भगवत्प्रेम कैसे मिलता है? | त्याग, समर्पण और प्रेम | सत्संग के बिखरे मोती | माला 3| मनका 73-108 |
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॥ राधे कृष्ण ॥
इस पाठ में हम सत्संग के बिखरे मोती की तृतीय माला के मनके 73 से 108 तक का श्रवण करेंगे।
इन मनकों में भगवत्प्रेम के लिये त्याग, विषयासक्ति से मुक्ति, भगवान् में ममता का समर्पण, प्रेम की व्यापक दृष्टि और भगवत्प्रेम की अद्भुत महिमा का वर्णन मिलता है।
आगे संतों की महिमा भी अत्यन्त मार्मिक रूप में सामने आती है—सच्चे संत बुराई करनेवाले का भी मंगल करते हैं और उनके द्वारा किसीका अहित नहीं होता।
भाईजी के ये सत्संग-वचन बताते हैं कि प्रेम की वास्तविक उन्नति हृदय के विस्तार में है—जहाँ वैर मिटता है और सबके मंगल की भावना जागती है।
यह पाठ मनके 73 से 108 पर आधारित है।
शांत मन से सुनिए, मनन कीजिए और जो भाव हृदय को छू जाए, उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास कीजिए।
पुस्तक: सत्संग के बिखरे मोती
लेखक: परम श्रद्धेय श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार (भाईजी)
भाग: तृतीय माला
पाठ: मनके 73–108
यदि इन सत्संग-वचनों में आपको कोई प्रिय भाव मिले, तो इसे अपने किसी निकटजन तक भी पहुँचा सकते हैं।
॥ राधे कृष्ण ॥
॥ श्रीराधाकृष्णार्पणमस्तु ॥
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