"पंचास्तिकाय का सार", पार्ट - 2, व्या. डॉ वीरसागर जैन, वसंतकुंज, नई दिल्ली -13.09.2026
Sudhesh Jain
0:00 / 0:00
"पंचास्तिकाय का सार", पार्ट - 2, व्या. डॉ वीरसागर जैन, वसंतकुंज, नई दिल्ली -13.09.2026
311 просмотров · 13 дней назад
Sudhesh Jain
1,29 тыс. подписчиков
311 просмотров · 13 дней назад
पंचास्तिकाय का सार , पार्ट-2
इंदसदवंदियाणं तिहुअणहिदमधुरविसद वक्काणं । अंतातीदगुणाणं णमो जिणाणं जिदभवाणं ||1||
अर्थ- सौ इंद्र जिन्हें वंदना करते हैं, जिनके वचन तीन लोक के जीवों का हित करने वाले मधुर एवं विशद हैं, जो अनंत गुणों के धारक हैं और जिन्होंने चतुर्गति रूप संसार को जीत लिया है, मैं उन जिनेन्द्र देव को नमस्कार करता हूँ।
दंसणणाण चरित्ताणि मोक्खमग्गो ति सेविदव्वाणि । साधूहिं इह भणिदं तेहिं दु बंधो व मोक्खो वा ||164||
अर्थ- दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्षमार्ग है इसलिये वे सेवन योग्य हैं- ऐसा साधुओं ने कहा है, परन्तु उनसे बंध भी होता है और मोक्ष भी होता है।
अण्णाणादो णाणी जदि मण्णदि सुद्धसंपओगादो | हवदि त्ति दुक्खमोक्खं परसमयरदो हवदि जीवो ||165||
अर्थ- शुद्ध संप्रयोग से दुःख मोक्ष होता है-यदि ऐसा अज्ञान के कारण ज्ञानी माने तो वह परसमयरत जीव है।
अरहंतसिद्ध-चेदि य-पवयण-गण-णाण-भत्ति -संपण्णो ।
बंधदि पुण्णं बहु सो ण हु सो कम्मक्खयं कुणदि ||166||
अर्थ – अर्हंत, सिद्ध, चैत्य, प्रवचन, मुनिगण और ज्ञान के प्रति भक्ति सम्पन्न जीव बहुत पुण्य बाँधता है, परन्तु वास्तव में वह कर्म का क्षय नहीं करता ।
जस्स हिदयेsणुमेत्तं वा परदव्वम्हि विज्जदे रागो।
सो ण विजाणदि समयं सगस्स सव्वागमधरो वि ||167||
अर्थ- जिसके हृदय में परद्रव्य के प्रति अणुमात्र भी राग वर्तता है वह, भले ही सर्व आगमधर हो तथापि , स्वकीय समय को नहीं जानता ।
धरिदुं जस्स ण सक्कं चित्तुब्भामं विणा दु अप्पाणं। रोधो तस्स ण विज्जदि सुहासुहकदस्स कम्मस्स ||168||
अर्थ- जो चित्त के भ्रमण बिना अपने को नहीं रख सकता, उसके शुभाशुभ कर्म का निरोध नहीं है।
तम्हा णिव्वुदि कामो णिस्संगो णिम्ममो य हविय पुणो।
सिद्धेसु कुणदि भत्तिं णिव्वाणं तेण पप्पोदि ||169||
अर्थ - इसलिये मोक्षार्थी जीव निःसंग और निर्मम होकर सिद्धों की भक्ति करता है, इसलिये वह निर्वाण को प्राप्त करता है।
सपयत्थं तित्थयरं अभिगदबुद्धिस्स सुत्तरोइस्स । दूरतरं णिव्वाणं संजमतवसंपओत्तस्स ||170||
अर्थ- संयम-तप-संयुक्त होने पर भी, नव पदार्थों तथा तीर्थंकर के प्रति जिसको बुद्धि का झुकाव वर्तता है और सूत्रों के प्रति जिसे रुचि वर्तती है, उस जीव को निर्वाण दूरतर है।
अरहंतसिद्धचेदियपवयणभत्तो परेण णि यमेण।
जो कुणदि तवोकम्मं सो सुरलोगं समादियदि ||171||
अर्थ- जो अर्हंत, सिद्ध, चैत्य और प्रवचन के प्रति भक्ति युक्त वर्तता हुआ, परम संयम सहित तपकर्म करता है, वह देवलोक को सम्प्राप्त करता है।
तम्हा णिव्वुदिकामो रागं सव्वत्थ कुणदु मा किंचि । सो तेण वीदरागो भवियो भवसायरं तरदि ||172||
अर्थ - इसलिये मोक्षाभिलाषी जीव सर्वत्र किंचित् भी राग न करो, ऐसा करने से वह भव्य जीव वीतराग होकर भवसागर को तरता है।
मग्गप्पभावणट्ठं पवयणभत्तिप्पचोदिदेण मया।
भणियं पवयणसारं पंचत्थियसंगहं सुत्तं ||173||
अर्थ - प्रवचन की भक्ति से प्रेरित ऐसे मैंने मार्ग की प्रभावना के हेतु प्रवचन के सारभूत पंचास्तिकायसंग्रहसूत्र को कहा है।