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श्रीगीता ज्ञान यज्ञ भाग 33बुद्धि योग11वां अध्याय विश्वरूप दर्शन का शुभारंभभाग-११ ‪@bhaktimeshakti2281‬

Bhakti me Shakti

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श्रीगीता ज्ञान यज्ञ भाग 33बुद्धि योग11वां अध्याय विश्वरूप दर्शन का शुभारंभभाग-११ ‪@bhaktimeshakti2281‬

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Ram bhakti ‪@bhaktimeshakti2281‬ परम पूज्य डॉक्टर श्री विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से ((2073)) श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 33 बुद्धि योग(विभूति योग)पर चर्चा 11वां अध्याय विश्वरूप दर्शन का शुभारंभ भाग-११ आज मन में आया तेतीस करोड़ देवता है, शास्त्र कहता है । आज मन में आया, अवसर है । चलो भगवान की सेवा करते हैं । भगवान इस धरती पर अवतरित हुए हैं, हो गए हैं । अतएव बहुत से देवता वानर बनकर तो भगवान राम की सेवा के लिए उपस्थित हुए । पेड़ बनकर वा अन्य कुछ-कुछ बनकर तो भगवान कृष्ण की सेवा, व उनके साथ लीला इत्यादि करने के लिए, उनकी लीला अवलोकन करने के लिए योनियां धारण की । जो देव परमात्मा के दर्शनों को, परमात्मा की सेवा को, तरसते हैं; मुझे आश्चर्य होता है सुनकर जब कोई कहता है कि अमुक देवता ने यह कहा है कि राम राम जपना बंद कर । कोई ऐसे देवता, देवी देवता इस संसार में नहीं हो सकता । सारे ब्रह्मांड में नहीं हो सकता, जो यह कहे किसी को, राम-राम जपने वाले को, यह कहे कि राम राम मत जप, माला मत फेर । ऐसा पाप कोई देवी देवता कभी नहीं करेंगे। यह पाप है । हां, स्वार्थी लोगों का बीच में हाथ हो, तो उनका पतन हो सकता है । वह स्वार्थी हैं, वह निष्कामी नहीं है । आप बहुत भोली हो देवियो । यहां की लाहौल की देवियां, यहां के सज्जन, यहां के पुरुष बहुत भोले हो । सोच समझकर इन बातों में आया करो । परमेश्वर ने आपको राम नाम दिया है । अपना नाम दिया है, दिलवाया है । आप अपनी दुर्बुद्धि को, मंदबुद्धि को कुशाग्र बुद्धि, तीव्र बुद्धि, तेज बुद्धि बनाइएगा । उसी सद्बुद्धि की साधक जनों चर्चा हो रही है । कल उस युवक को भगवान ने अपना अधिकारी बना लिया है । अपना उत्तराधिकारी बना लिया है । स्वयं महाराज ने उसे अपना उत्तराधिकारी, अपना यंत्र, अपनी सेवा के योग्य, बना लिया है । क्यों ? वह निष्काम भाव से, निस्वार्थ भाव से, कर्म कर रहा है । स्वार्थी नहीं । ऐसे कर्मों को गीता जी में तीसरे अध्याय में यज्ञार्थ कर्म कहा है । वह यज्ञ कर्म कर रहा है, यज्ञ के लिए कर्म कर रहा है, यज्ञ रूपी कर्म कर रहा है । कर्म कांड में यज्ञ उसे कहा जाता है, जहां हवन इत्यादि मंत्रों का उच्चारण हो । आप सब जानते हैं, विशेषतया ब्राह्मण, आप ही करवाते है । कर्मकांडी है, वह यज्ञ का अर्थ यही मानते हैं, जैसे पुत्रेष्टि यज्ञ; पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ किया गया । मानो उसके अंदर कोई कामना है, यह चाहिए, इसके लिए यज्ञ किया गया है । यज्ञ शत्रुओं का हनन करने के लिए भी किया जाता है । शत्रु का हनन हो, मेरे घर में यह हो, इत्यादि इत्यादि । मानो यज्ञ के साथ कोई ना कोई कामना जुड़ी हुई है । ऐसे कर्म साकाम कर्म होते हैं। निष्काम कर्म अर्थात यज्ञार्थ कर्म । भगवान श्री कहते हैं कि, यज्ञ के कर्म, गीता जी के अनुसार यज्ञ अर्थात निष्काम कर्म । तीसरा अध्याय पढ़िए । आप पढ़ चुके हो फिर पढ़ना । ऐसे कर्म जो दूसरों के लिए किए जाते हैं, दूसरों को सुख बांटने का कर्म, प्रेम बांटने का कर्म, दूसरों को देना, कुछ दूसरों के काम आने का कर्म, इसे यज्ञ अर्थ कर्म कहा जाता है । निष्काम कर्म कहा जाता है । परमात्मा की सेवा के लिए, भजन पाठ के लिए, साधना के लिए, अपनी सेहत का ध्यान रखना निष्काम कर्म, यज्ञार्थ कर्म । दूसरों को प्रेरित करके साधक बनाना, उनको परमात्मा के श्री चरणों में लाना, उनको दीक्षा के लिए तैयार करना, उनको राम नाम के लिए जपने के लिए प्रोत्साहित करना, भगवान श्री कहते हैं यह यज्ञार्थ कर्म है । इनमें स्वार्थ नहीं है । स्वार्थ से कर्म निष्काम नहीं रहता । जो कुछ आपको मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पाता, जो निस्वार्थ कर्म करने से मिलता है । कल आपने देखा । कल आपसे अर्ज की जा रही थी, ऐसो को परमात्मा के पास जाने की जरूरत नहीं । परमात्मा स्वयं उनके पास पहुंचता है । क्यों? उसे भी तो चाहिए अपना काम करवाने वाले व्यक्ति । अपनी सृष्टि उसे चलानी है । अतएव वह कईयों को तैयार करता है । किसी से किसी प्रकार का काम लेता है, किसी से किसी प्रकार का काम लेता है, किसी से किसी प्रकार का काम लेता है । मानो हम सब काम करने वाले, जितने भी दिखाई देते हैं, यह परमात्मा के ही हाथ हैं, परमात्मा के ही पांव है, परमात्मा की ही आंखें हैं । विश्वरूप दर्शन में सब कुछ आपको यही कुछ देखने को मिलेगा । ऐसा विश्वास ना होने दे वह दुर्बुद्धि है । ऐसा विश्वास जब अंदर बस जाए तो वह सद्बुद्धि है, वह विवेक युक्त बुद्धि है । जो सद्बुद्धि मन हो जाया करता है, वह इधर-उधर नहीं भटका करता । वह औरों की बातों में फिसलता नहीं है । वह भटकता नहीं है । उसकी तार परमात्मा के साथ जुड़ी रहती है, और उससे वह संतुष्ट रहता है । मुझे इतना विश्वास मेरे कर्मों के अतिरिक्त मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता । कभी-कभी माताओं आप लोग ऐसे शब्द प्रयोग करती हो की, जब से यह बहू मेरे घर आई हुई, तब से इसने मेरे घर का सत्यानाश कर दिया हैं । मेरा घर उजड़ गया है । ऐसा शब्द राम नामियों को शोभा नहीं देता। यह अविश्वास के चिन्ह हैं । मानो आपको यह विश्वास नहीं है, जो कुछ भी हमारे जीवन में घटित होता है, वह विधाता के विधान के अनुसार घटित होता है । या यूं कहिएगा वह हमारे कर्मों के अनुसार घटित होता है । समय तो हो गया साधक जनो । कल जारी रखेंगे इसी चर्चा को । आज यहीं समाप्त करने की इजाजत दीजिएगा । धन्यवाद ।