आजु वन नीकौ रास बनायौ श्री हित चतुरासी पद 36 भाग 1 Radha Krishna Raas Geetaji
GitaJi
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आजु वन नीकौ रास बनायौ श्री हित चतुरासी पद 36 भाग 1 Radha Krishna Raas Geetaji
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राधे राधे 🙏🏻🌸
श्री हित चतुरासी जी की 84 पदों की भाव-यात्रा में प्रस्तुत है—
✨ पद 36, भाग 1: “आजु वन नीकौ रास बनायौ” ✨
श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी इस पद में यमुना जी के पवित्र तट पर प्रकट हुई दिव्य रास-लीला का वर्णन करते हैं।
मोहन की बाँसुरी बजते ही संपूर्ण वन प्रेम-रस में जाग उठता है। सखियों के कंगन, किंकिणी और नूपुर बाँसुरी के सुरों से ताल मिलाने लगते हैं। पक्षी और वन के पशु भी इस मधुर संगीत को सुनकर आनंद में डूब जाते हैं।
सखियों के मंडल के मध्य मेघ के समान सुंदर घनश्याम राग सारंग बजा रहे हैं। मृदंग, मुरज और डफ की ताल से यमुना तट प्रेम के विशाल रस-सिन्धु में बदल जाता है। इस रास की अधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी राधारानी अपनी प्रत्येक गति से दिव्य प्रेम प्रकट करती हैं।
🌸 मूल पद—भाग 1 🌸
आजु वन नीकौ रास बनायौ।
पुलिन पवित्र सुभग यमुना-तट, मोहन बेनु बजायौ॥
कल कंकन किंकिनि नूपुर धुनि, सुनि खग-मृग सचु पायौ।
जुवतिनु मण्डल मध्य श्याम घन, सारंग राग जमायौ॥
ताल मृदंग उपंग मुरज डफ, मिलि रस-सिन्धु बढ़ायौ।
विविध विसद वृषभानुनन्दिनी, अंग सुधंग दिखायौ॥
✨ आज के पद का भाव:
जब मन, स्वर, ताल और जीवन की प्रत्येक गति अपने आराध्य को समर्पित हो जाए—तब साधारण जीवन भी दिव्य रास बन जाता है।
वीडियो पूरा सुनें और Comment में प्रेम से लिखें—
“मेरे मन में राधा, मेरे स्वर में श्याम।”
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पद 36 के अगले भाग में हम राधारानी की सुंदर नृत्य-गति और इस दिव्य रास के आगे के भाव का अनुभव करेंगे।
राधे राधे 🙏🏻
— गीताजी
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