"हमें छोड़ दीजिए, मूर्तियाँ ले जाइए" | मुल्तान का जैन मंदिर
Jain Kwiz
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"हमें छोड़ दीजिए, मूर्तियाँ ले जाइए" | मुल्तान का जैन मंदिर
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अस्वीकरण: यह कथा विभाजन काल की एक प्रसिद्ध जनश्रुति पर आधारित है, जो जैन समाज में पीढ़ियों से सुनाई जाती है। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म या व्यक्ति की भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। यह वीडियो सभी धर्मों के प्रति पूर्ण आदर भाव के साथ प्रस्तुत है।
सन् 1947 — बँटवारे की आग चारों ओर फैली थी। मुल्तान का डेढ़ सौ वर्ष पुराना भव्य जैन मंदिर पीछे छूट रहा था, और समाज के सामने खड़ा था एक ऐसा प्रश्न, जिसका उत्तर देना आसान नहीं था — विमान में जगह सीमित है, तो मूर्तियाँ जाएँ या लोग?
इस कथा में आप जानेंगे:
• मुल्तान का वह जैन मंदिर, जिसकी दीवारों पर सभी तीर्थंकरों के चित्र और णमोकार मंत्र अंकित थे
• दिल्ली से बंबई तक विमान की तलाश और प्रति व्यक्ति चार सौ रुपये का किराया
• 85 मूर्तियाँ, सारी जिनवाणी — और पायलट का "यह विमान दुगना लदा है" कहकर इनकार
• बहनों का वह त्याग — "हमें यहीं छोड़ दीजिए, पर मूर्तियाँ अवश्य ले जाइए"
• णमोकार मंत्र के जाप के बीच उड़ान और बहनों का अन्न-जल त्याग का संकल्प
• जोधपुर की सकुशल लैंडिंग और पायलट के वे शब्द — "इतना भारी होकर भी इतना हल्का"
• पायलट का आजीवन मांसाहार और मदिरा त्याग का नियम
• आज ये मूर्तियाँ और जिनवाणी जयपुर के आदर्श नगर स्थित मुल्तान जैन मंदिर में विराजमान हैं
पंडित श्री टोडरमल जी की प्रसिद्ध "रहस्यपूर्ण चिट्ठी" भी मुल्तान के साधर्मी बंधुओं को ही लिखी गई थी।
शिक्षा: अपने धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा। जहाँ श्रद्धा सच्ची होती है, वहाँ भार भी हल्का हो जाता है।
⏱ टाइमस्टैम्प
00:00 अस्वीकरण एवं परिचय
00:24 मुल्तान का जैन मंदिर
00:35 सन् 1947 · विभाजन
00:48 समाज की चिंता
01:00 विमान की खोज
01:20 मूर्तियाँ विमान में
01:33 पायलट का इनकार
01:41 बहनों का त्याग
01:54 लोग या मूर्तियाँ
02:10 णमोकार मंत्र
02:31 संकल्प
02:40 सकुशल जोधपुर
02:58 पायलट का नियम
03:34 कहानी की शिक्षा
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