25 साल से अंधेरी झोंपड़ी में… उम्रभर बोझ उठाया, अब काम कौन देगा?
Mohan Jaryal
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25 साल से अंधेरी झोंपड़ी में… उम्रभर बोझ उठाया, अब काम कौन देगा?
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Mohan Jaryal
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उम्र भर जिन कंधों ने दूसरों का बोझ उठाया, आज उन्हीं कंधों पर अपने बुढ़ापे की रोज़ी-रोटी की चिंता है। इन बुज़ुर्ग ने अपनी ज़िंदगी मेहनत करके गुज़ारी है। भारी सामान उठाया, बोझा ढोया और जितना कमा सके, उसी में जीवन चलाया। पिछले 25 सालों से एक झोंपड़ी उनका घर है। अब उम्र बढ़ गई है, शरीर पहले जैसी मेहनत नहीं कर पाता और सुनने की परेशानी ने काम मिलने की राह और कठिन कर दी है। मेहनत करने की इच्छा होते हुए भी जब इंसान को उम्र के कारण काम न मिले, तो उसके सामने सिर्फ़ कमाई का सवाल नहीं रहता—अपने दम पर जीते रहने की चिंता भी खड़ी हो जाती है।
कुछ दिन पहले ये मेरे पास अपने मेडिकल से जुड़े काम के लिए आए थे। इन्हें सुनने में बहुत परेशानी हो रही थी। इनके बारे में हमारा पहले का वीडियो देखकर एक सेवादार भाई ने तुरंत इनके लिए सुनने की मशीन मंगवा दी। जब मशीन इनके कान में लगाई गई, तो इन्हें सुनने में मदद मिली। उस सेवादार का दिल से धन्यवाद, जिन्होंने वीडियो में दिख रहे एक इंसान की परेशानी को समझा और मदद के लिए कदम बढ़ाया।
इसके बाद मैं इनका घर देखने पहुँचा। बाहर से दिखने वाली झोंपड़ी के भीतर तीन लोगों की पूरी ज़िंदगी बसी है। इनके साथ रिश्ते में इनकी भाभी लगने वाली एक बुज़ुर्ग महिला और उनका पोता रहते हैं। मिट्टी का चूल्हा, कुछ बर्तन और गुज़ारे भर का सामान—इन्हीं सीमित साधनों में उनका रोज़ का जीवन चलता है। उस जगह को देखकर यही ख़याल आया कि जिसे हम कुछ देर देखकर लौट जाएँगे, वहीं इन्हें हर सुबह उठना है, हर दिन गुज़ारना है और हर रात सोना है।
ये बुज़ुर्ग कबाड़ बेचकर कुछ पैसे जुटाते हैं। उनकी भाभी लोगों के घरों में बर्तन धोकर घर चलाने में साथ देती हैं। दोनों में से जिसके पास पैसे होते हैं, वही राशन ले आता है। बच्चा स्कूल जाता है। इस छोटे से घर में एक-दूसरे का साथ है, लेकिन कमाई का कोई भरोसा नहीं। बढ़ती उम्र के साथ काम मिलना मुश्किल होता जा रहा है, और जो काम मिलता भी है, उसे करने के लिए शरीर का साथ देना ज़रूरी है।
उनके मुताबिक, काम देने वाले उम्र, कमज़ोर होती ताक़त और सुनने की परेशानी के कारण उन्हें काम नहीं देते। सोचिए, जिसने पूरी ज़िंदगी शारीरिक मेहनत के सहारे गुज़ारी हो और जिसे कोई दूसरा काम आता भी न हो, वह इस उम्र में कहाँ जाए? जिस समय किसी बुज़ुर्ग को बैठकर सुकून से खाना मिलना चाहिए, उस समय भी उन्हें उसी खाने के इंतज़ाम की चिंता करनी पड़ रही है।
सुनने की मशीन ने उनकी एक परेशानी में राहत दी है। लेकिन उनकी कहानी हमें उन ज़रूरतों की ओर भी ले जाती है जो किसी एक मदद से पूरी नहीं होतीं—नियमित राशन, सुरक्षित छत और उम्र के इस पड़ाव पर सम्मान के साथ जीने का सहारा। ये तीनों अपनी ओर से घर चलाने की कोशिश कर रहे हैं। ज़रूरत है कि उनकी मेहनत और मुश्किलों को समझा जाए।
इस वीडियो में उनकी अपनी ज़ुबानी उनकी कहानी सुनिए। उन हाथों को देखिए जिन्होंने बरसों मेहनत की है, और उस घर को देखिए जिसमें आज भी रोज़ के गुज़ारे के लिए संघर्ष जारी है। यदि आप मदद के लिए आगे आना चाहते हैं, तो पहले उनकी ज़रूरत समझिए और उनका सम्मान बनाए रखिए। इस कहानी को आगे साझा कीजिए, ताकि यह किसी ऐसे व्यक्ति तक पहुँच सके जो इनके जीवन में कुछ राहत ला पाए।
बुढ़ापे में हर इंसान इतना सुकून तो पाए कि शाम को बैठते समय अगली सुबह की रोटी की चिंता न करनी पड़े।
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