तीरंदाज़ी और खगोलशास्त्र: आर्यभट ने धनुष से ग्रहों को कैसे नापा? #astronomy #archery
Ravindra Godbole
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एशियाई खेलों में भारतीय तीरंदाज़ों की शानदार सफलता से शुरू होती है एक अनोखी कहानी: तीरंदाज़ी (Archery) और खगोलशास्त्र (Astronomy) का रिश्ता। धनुष के हिस्से, यानी चाप, ज्या, कोटि और शर, आज भी त्रिकोणमिति में Sine, Cosine और Versine बनकर ज़िंदा हैं। संस्कृत का "ज्या" अरबी में "जैब" बना, लैटिन में "Sinus" और फिर आज का "Sine"। इस वीडियो में हम समझेंगे कि आधुनिक sin θ एक अनुपात है, जबकि आर्यभट की ज्या एक वास्तविक लंबाई थी।
आर्यभट ने त्रिज्या R = 3438 क्यों चुनी, और यह रेडियन (Radian) की सोच से एक हज़ार साल पहले कैसे जुड़ती है? गणितपाद के जिस श्लोक में π = 3.1416 को "आसन्न" (लगभग) कहा गया है, उसे भी देखेंगे। गीतिकापाद के सिर्फ़ एक श्लोक में 24 मानों की पूरी ज्या-सारणी छिपी है, और हम जानेंगे कि आधा करने और पूरक लेने से उसे कैसे बनाया गया।
फिर चार आसान उदाहरणों को ज्या और आधुनिक sin θ, दोनों तरीकों से हल करेंगे: पतंग की ऊँचाई, पलभा से अक्षांश, लीलावती का कमल, और चंद्रमा का व्यास। साथ ही देखेंगे कि बिना कैलकुलेटर के sine कैसे निकलता था, और माधव की वह श्रेणी जो न्यूटन से 300 साल पहले आई। आइए जानें, कैसे 24 पूर्णांकों और एक धनुष की डोरी से हमारे पूर्वजों ने ग्रहों की चाल नापी।