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USA Retreat - संयम से सजगता का मार्ग

Dhamma Essence - Understanding Buddha Dhamma

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USA Retreat - संयम से सजगता का मार्ग

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Dhamma Essence - Understanding Buddha Dhamma
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यह वीडियो प्रवचन बुद्ध की शिक्षाओं पर आधारित है, जिसमें मुख्य रूप से इंद्रिय संवर (Sensory Restraint), भोजन में संयम (Bhojane Mattaññutā), और जागरुकता का अभ्यास (Jāgariyāna Yoga) जैसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक विषयों को व्यावहारिक उदाहरणों के साथ समझाया गया है। 1. इंद्रिय संवर (Indriya Samvara - इन्द्रियों का नियंत्रण) मज्झिम निकाय (Majjhima Nikaya) के 152वें सूत्र का संदर्भ देते हुए बताया गया है कि इंद्रिय संवर केवल एक जगह आँख बंद करके बैठने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे दिन सभी इंद्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ, शरीर, मन) के प्रति सजग रहने का अभ्यास है। दैनिक जीवन में हमारे सामने तीन प्रकार की चीजें या व्यक्ति आते हैं: मनाप (जो प्रिय या अच्छे लगते हैं), अमनाप (जो अप्रिय या बुरे लगते हैं), और मनाप-अमनाप (जो सामान्य या मिश्रित लगते हैं)। वक्ता ने Apple लैपटॉप, iPhone, पुराने iPad, और कमरे के कर्टन (पर्दे) या कुशन का उदाहरण देकर इसे व्यावहारिक रूप से समझाया है। दूसरों को बदलने की व्यर्थ कोशिश: हम अक्सर अपने परिवार के सदस्यों (जैसे भाई, पति, पत्नी, या बच्चों) को बदलने की कोशिश करते हैं, जो कि सबसे बड़ी समस्या है। हर व्यक्ति का अपना एक अलग मानसिक नजरिया और उसके जीवन का सफर होता है। वे हमारे स्वामित्व में नहीं हैं; समय आने पर वे अपनी राह चले जाएंगे। इसलिए किसी के व्यक्तिगत जीवन में अत्यधिक दखल देने से बचना चाहिए। उपेक्षा (Equanimity) का अभ्यास: बुद्ध के अनुसार, इसका सही समाधान यह है कि हम उपेक्षा में रहें। चीजों को केवल चीज की तरह और लोगों को केवल व्यक्ति की तरह देखें, बिना उनके साथ कोई नया संबंध या परिचय (जैसे बेटा, बेटी आदि) बनाए। जब उपेक्षा आती है, तो मन में परम आनंद (Bliss) का उदय होता है। 2. भोजन मत्तञ्ञुता (Bhojane Mattaññutā - भोजन में संयम) भोजन केवल शरीर को बनाए रखने और भूख रूपी बीमारी को दूर करने के लिए करना चाहिए, न कि स्वाद, मजे या शारीरिक सुंदरता के लिए। खाने की इंद्रिय (जीभ) का संवर सबसे कठिन माना गया है। वक्ता ने आभासार (Ābhassara) लोक का संदर्भ देते हुए बताया कि अतीत में जीवों द्वारा स्वाद के प्रति अत्यधिक लालच के कारण ही उनके स्थूल भौतिक शरीरों का निर्माण हुआ। हमें भोजन से होने वाले राग (लगाव) या द्वेष को हटाना है, न कि भोजन को पूरी तरह छोड़ना है। भोजन को हमेशा मापकर (मत्तता/नियमित मात्रा में) ही खाना चाहिए। 3. जागरियान योग (Jāgariyāna Yoga - सजगता का अभ्यास) जागरियान योग का अर्थ है मानसिक रूप से पूरी तरह जाग जाना, जो इंद्रिय संवर के सिद्ध होने पर स्वतः ही स्थापित हो जाता है। जबरन नींद न लेने का भ्रम: कुछ लोग बुद्ध की बातों का गलत अर्थ निकालकर जबरदस्ती नहीं सोते, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है और वे अस्पताल पहुंच जाते हैं। जब मन की बेचैनी शांत हो जाती है, तो शरीर को जितनी नींद आवश्यक होती है, वह अपने आप और पूरी ताज़गी के साथ उतनी नींद ले लेता है। साधना का सही क्रम: साधना हमेशा एक निश्चित क्रम में आगे बढ़ती है: शील ➜ इंद्रिय संवर ➜ भोजन मत्तञ्ञुता ➜ जागरियान योग। किसी भी चरण को लांघकर सीधे अंतिम चरण पर नहीं पहुंचा जा सकता। 4. शारीरिक स्वास्थ्य का महत्व बुद्ध की सीख "आरोग्यं परमं लाभं" का उल्लेख करते हुए शरीर की देखभाल को साधना के लिए अत्यंत आवश्यक बताया गया है। वक्ता ने अपना उदाहरण देते हुए बताया कि मौसम के बदलाव और खान-पान में लापरवाही के कारण उन्हें एसिडिटी हो गई, जिसके इलाज के लिए उन्हें रात में दवा के साथ कुछ खाना पड़ा। उन्होंने समझाया कि यदि स्वास्थ्य खराब है, तो हठधर्मिता छोड़कर बुद्धिमानी से सोच-विचार (योनि सो मनसिकार) कर कदम उठाना चाहिए। नींद और न्यूरोकेमिकल्स (जैसे मेलाटोनिन, सेरोटोनिन, डोपामाइन) के साथ खिलवाड़ करने से पार्किंसंस, रूमेटोइड अर्थराइटिस, और जोड़ों में दर्द जैसी लाइलाज बीमारियाँ हो सकती हैं। 5. आगामी विषय (सती और संपजन्य) प्रवचन के अंत में बताया गया है कि अब तक जो अभ्यास किया गया वह 90% शमथ (Samatha - मानसिक एकाग्रता) पर आधारित था। अगले दिन सती (Sati - स्मृति/सजकता) और संपजन्य (Sampajañña - स्पष्ट ज्ञान) के भेद और अभ्यास को समझाया जाएगा, जो ध्यान की गहराई में जाने के लिए आवश्यक हैं।