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Setubandh Shri Rameshwaram Darshan सेतुबन्ध श्री रामेश्वरम् दर्शन #setubandhshrirameshwaramdarshan

Rajnish's Digital Diaries

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Setubandh Shri Rameshwaram Darshan सेतुबन्ध श्री रामेश्वरम् दर्शन #setubandhshrirameshwaramdarshan

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प्राचीन काल से ही भारत में तीर्थों की धार्मिक महत्ता रही है। इसी महत्व को बनाए रखने के लिए एवं विशाल भारतवर्ष को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए परम पवित्र चार धामों की स्थापना चार दिशाओं में की गई है। उत्तर दिशा में हिमालय की गोद में बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारकापुरी, पूर्व में जगन्नाथपुरी तथा सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित है रामेश्वरम धाम। भौगोलिक दृष्टि से चार धाम एक परिपूर्ण वर्ग का निर्माण करते हैं, जिसमें बद्रीनाथ और रामेश्वरम एक देशांतर पर पड़ते हैं एवं द्वारका और जगन्नाथपुरी एक ही अक्षांश पर पड़ते हैं।  रामेश्वरम धाम हिन्दुओं के सभी पवित्र तीर्थों में से एक है तथा प्रकृति की सुंदरता के साथ-साथ ही यह तमिलनाडु के रामनाथपुरम् ज़िले में स्थित एक विशालकाय और भव्य मंदिर है। इसके अलावा यहां स्थापित शिवलिंग, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। भारत के उत्तर मे काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम् की है। पुराणों में रामेश्वरम का नाम गंधमादन बताया गया है। रामेश्वरम चेन्नई से लगभग 425 मील दक्षिण-पूर्व में है। यह हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुन्दर शंख के आकार का एक द्वीप है। काफी समय पूर्व यह द्वीप भारत की भूमि से जुड़ा हुआ था, परन्तु बाद में सागर की लहरों ने भारत और द्वीप के भूमि रास्ते को काट डाला, जिससे वह चारों ओर पानी से घिरकर टापू बन गया। रामेश्वरम मंदिर जाने के लिए कंक्रीट के 145 खम्भों पर टिका करीब सौ साल पुराना पुल है। रामेश्वरम जाने वाले लोग इस पुल से होकर गुज़रते हैं। समुद्र के बीच से निकलती ट्रेन का दृश्य बहुत ही रोमांचक होता है। इस पुल के अलावा सड़क मार्ग से जाने के लिए एक और पुल भी बनाया गया है। यहां दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। द्रविड़ शैली में बना यह मंदिर निर्माण कला और शिल्प कला की सुंदरता का प्रतीक है। रामेश्वरम मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे बड़ा गलियारा है।  यहां भगवान राम ने नल एवं नील नामक दो बलशाली वानरों की सहायता से लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व एक पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिसे रामसेतु कहा गया। यह वही रामसेतु है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘एडेम्स ब्रिज’ के नाम से जाना जाता है। नल और नील को एक ऋषि का श्राप था कि तुम दोनों जिस वस्तु को भी पानी में फेकोगे वह नहीं डूबेगी। यही श्राप सेतु बनाते समय भगवान राम के काम आया, इसलिए वह दोनों योद्धा पत्थरों को जल में डालते गए और एक विशाल सेतु का निर्माण हो गया। जिस पर चढ़कर वानर सेना ने लंका पहुंच विजय पाई। बाद में श्री राम ने विभीषण के अनुरोध पर धनुषकोटि नामक स्थान पर यह सेतु तोड़ दिया था। आज भी इस 30 मील (48  कि.मी.) लम्बे सेतु के अवशेष सागर में दिखाई देते हैं। रामेश्वरम मंदिर में ये पत्थर आज भी भक्तों के दर्शन के लिए रखे गए हैं।  रामचरित मानस के अनुसार इस मंदिर में जो शिवलिंग हैं, उसके पीछे मान्यता यह है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ..रावण को उसके किये गये दुष्कर्म का दण्ड देने लंका जा रहे थे, तभी लंका तक जाने के लिये मार्ग में विशाल सागर पड़ा.. जिसके लिये उन्होने समुद्रदेव से लगातार तीन दिवस तक प्रार्थना किया परन्तु सागर द्वारा मार्ग नही दिया..तत्पश्चात भगवान श्री राम को क्रोध आ गया और उन्होने समुद्र को सुखाने के लिये अपने धनुष पर बाण का संधान किया.. यह देख समुद्र भय से कांपते हुए श्री राम से क्षमा प्रार्थना किया और कहा कि जल अपनी प्रकृति कैसे छोड़ सकता है..हे प्रभु...जल का ये गुण आप ही के द्वारा प्रदान किया गया है..मेरे सूखजाने से मेरे जल में वास करने वाले असंख्य जीवजन्तुवों का भी विनाश हो जायेगा...एक मार्ग है प्रभु आप अपनी सेना में दो वानरों नल और नील की सहायता से एक पुल का निर्माण करें...मैं यहां पर अपने मूल गुण जो सागर की चंचल लहरें होती हैं...उन्हें शान्त कर दूंगा और आपके बनाये पुल की सुरक्षा करुंगा भगवान राम ने अपनी विशाल सेना की मदद से नल नील के निर्देशन में एक मजबूत पत्थरों के पुल का निर्माण कराया... जब पुल निर्माण का कार्य पूर्ण हो गया और लंका की ओर प्रस्थान करने का समय आया .. उन्होंने अपने ईष्ट देव भगवान शंकर से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिये भगवान राम ने बालू का पार्थिव शिवलिंग स्थापित करके शिव पूजन किया था, क्योंकि भगवान राम जानते थे कि रावण भी शिव का परम भक्त है और युद्ध में हरा पाना कठिन कार्य है, इसलिए भगवान राम ने लक्ष्मण सहित शिवजी की आराधना की इसपर भगवान शिव प्रसन्न होकर माता पार्वती के साथ प्रकट होकर श्री राम को विजय का आशीर्वाद दिया। भगवान राम ने शिवजी से लोक कल्याण के लिए उसी स्थान पर शिवलिंग के रूप में सदा के लिए निवास करने को कहा जिसे भगवान शिव ने स्वीकार कर लिया। और ये स्थान कालांतर में रामेश्वर...अर्थात राम के ईश्वर के रूप में प्रसिद्ध हुआ रामेश्वरम हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख जैसे का आकार द्वीप है। टापू के दक्षिणी कोने में धनुषकोटि नामक तीर्थ है, यहां भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिसके प्रत्येक पथ्तरों पर राम नाम लिख गया ऐसा माना जाता है कि जिन पत्थरों पर राम का नाम लिखा हुआ था वह पानी में नहीं डूबे जिन पर चढ़कर वानर सेना लंका पहुंची व वहां विजय पाई। यह मंदिर क्षेत्र 15 एकड़ में बना हुआ है। इस मंदिर में 12 वीं शताब्दी से विभिन्न शासकों के शासनकाल के दौरान बदलाव आया है। यह अपनी शानदार सुंदरता के लिए जाना जाता है रामेश्वरम मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे बड़ा गलियारा माना जाता है। यह उत्तर-दक्षिण में 197 मी. एवं पूर्व-पश्चिम 133 मी. है जिसकी चौड़ाई 6 मी. तथा ऊंचाई 9 मी. है। गोपुरम, मंदिर के द्वार से लेकर मंदिर का हर स्तंभ, हर दीवार वास्तुकला की दृष्टि से अद्भुत है। #rajnish'sdigitaldiaries