सिरोही राजमहल दुर्ग की भव्यता ओर इतिहास Sirohi Fot
Mahendra Singh Bhinmal
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सिरोही राजमहल दुर्ग की भव्यता ओर इतिहास Sirohi Fot
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Mahendra Singh Bhinmal
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अक्षय द्वितीया (आखाबीज) को सिरोही नगर का स्थापना दिवस था ।
सिरोही नगर स्थापना को लेकर रोचक कहानी हैं ।
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उन दिनों सिरोही रियासत में आखातीज पर शिकार से वर्षभर के शगुन देखे जाते थे । इसमें खरगोश का शिकार प्रमुख रूप से किया जाता था । इतिहासकारों के अनुसार आखातीज पर शिकार की परम्परा कायम रखने के लिए महाराव सहस्त्रमल दूज को सारणेश्वर मार्ग के बिजोला की ओर करीब पाँच सौ घुड़सवारों और पच्चीस लाऊरी श्वानों के साथ रवाना हुए । राजा का कारवां गुजरने के दौरान एक नर खरगोश अचानक से झाड़ियों से निकला और आबू की ओर करीब एक किलोमीटर तेज भागा । उसके पीछे श्वानों का टोला लग गया । एक किलोमीटर तेज भागने के बाद अचानक से खरगोश आक्रमण की मुद्रा में खडा़ हो गया, अब उसकी तरफ एक भी श्वान नहीं जा रहा था । सभी श्वान दूर से ही घेरा बनाकर भौंकने लगे । तत्कालीन महाराव सहस्त्रमल ऐसा दृश्य देख हैरान हो गए और सरदार से पुछा कि अभी तो खरगोश जोर से भाग रहा था, लेकिन अचानक ये क्या हुआ ? इस पर सरदार ने कहा कि यह वीर भूमी हैं। यह अब शेर हो गया हैं । राजा ने उस भूमि का महात्मय और शौर्य भूमि जानकर उसी जगह पर आखाबीज, गुरूवार सन् 1425 को पेड़ लगा दिया और उसी दिन सिरोही के स्थापना की नींव रखी, जहाँ आज उसी जगह महल बने हुए हैं । देश स्वतंत्र होने तक यही स्थान सिरोही रियासत की राजधानी रहा ।
सिरोही नगर को लेकर यह दोहा प्रसिद्ध हैं-
संवत चौदह सौ, बरस बयासी बखाणें।
बैसाख सुद दूज, जको गुरूवार ही जाणें।
श्री नृप चढे शिकार, पश्चिम दिशा हालियों।
शांचाणे खरगोश फालदें, पाछों फरियों।।
शूरमी जगह जाण, राव मन में विचारी।
सहस्त्रमल राव शोभा तनें, सिरोही थापन करी ।।
आज देवनगरी के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाला सिरोही अपनी हरीभरी वादियों, देवस्थानों, माउंट आबू अपने पर गुरू शिखर जैसी राजस्थान की सर्वोच्च छोटी को लिए पर्यटन में विशेष दर्जा रखता हैं । सिरोही शहर की बात करे तो बहुत ही छोटा, सुन्दर, हराभरा और एकदम क्लीन यहां तक की अपराध से भी दूरी बनाये हुए हैं । मुझे भी लंबे समय इस शहर और जिले में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । सिरोही के कॉलेज, सारणेश्वर मंदिर, गांधी पार्क, हाउसिंग बोर्ड, सारणेश्वर लाईब्रेरी, पैलेस रोड़, बाबा रामदेव ढाबा, हीरजी बा का ढाबा, अरविंद पैवेलियन/हॉस्टल और गोयली चौराहा , रिक्शे वाला मिथुन, माउंट आबू, पावापूरी धाम, भेरूतारक धाम, वराडा़ हनुमानजी, सरस्वती मंदिर अजारी, पोसालिया गौतमजी मेला, राम झरोखा के गरबे और पूज्य चंदनगिरी जी बावजी की तपोस्थली साडका मंदिर की यादें हमेशा आती रहेगी ।