पति-पत्नी के इस रोज़ के क्लेश के पीछे छिपा है ये खौफनाक ज्योतिषीय सच
PT. NARMDESHWAR SHASTRI
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पति-पत्नी के इस रोज़ के क्लेश के पीछे छिपा है ये खौफनाक ज्योतिषीय सच
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आप और आपके साथी बाजार जाते हैं, आपको एक चीज अच्छी लगती है और सामने वाले का चेहरा उतर जाता है। घर का पर्दा बदलते हैं तो आवाज आती है, यह रंग तो बस तुम्हें ही पसंद आ सकता है। पैसा खर्च करने पर एक को जरूरी लगता है, दूसरे को फिजूल। फिर एक दिन कोई एक कह देता है, हमारी पसंद कभी नहीं मिलती। यह आपके स्वभाव की बात नहीं; यह दोनों की कुंडली के एक ही ग्रह, शुक्र, की बात है, और वह दोनों कुंडलियों में कितनी राशि दूर बैठा है, उसी से तय है कि आप दोनों एक ही दुकान में खुश होंगे या अलग-अलग दुकान में। आज वही गिनती, अभी दोनों की कुंडली पर लगाइए।
आधार: शुक्र प्रेम, सुख और सौंदर्य का ग्रह है; कपड़ा, रंग, घर की सजावट, खाना, घूमना, संगीत और पैसा किस चीज पर खर्च होगा, यह सब शुक्र का विभाग है। हर आदमी का शुक्र किसी राशि में है और वही राशि उसकी पसंद का साँचा है। शास्त्र में राशियों के आपसी रिश्ते के नाम तय हैं: एक ही राशि, सम-सप्तक (आमने-सामने), त्रिकोण (नवम-पंचम), षडाष्टक (छठी-आठवीं), द्विर्द्वादश (दूसरी-बारहवीं), केंद्र (चौथी-दसवीं)। बस इतना करना है: अपने शुक्र की राशि से साथी के शुक्र की राशि तक गिनिए। कारण: राशियों के चार तत्व हैं और तत्वों की आपस में मैत्री है, अग्नि और वायु मित्र, पृथ्वी और जल मित्र; जो राशियाँ एक-दूसरे से 1, 5 या 9 पर हैं वे एक ही तत्व की, 3, 7 या 11 पर मित्र तत्व की, और 2, 4, 6, 8, 10 या 12 पर विरोधी तत्व की। यानी शुक्र की दूरी असल में दो पसंदों के तत्व का रिश्ता है।
सात जोड़ियाँ (शास्त्री जी के अनुभव से): (1) दोनों के शुक्र एक ही राशि में: पसंद एक, बाजार में झगड़ा नहीं, पैसा एक ही चीज पर; सुख बहुत, पर कमी भी, नयापन नहीं, कोई रुको कहने वाला नहीं; लड़ना भी जरूरी है। (2) पाँचवीं या नौवीं राशि में: एक ही परिवार की पसंद; एक को पहाड़, दूसरे को समुद्र, पर घूमना दोनों को; सबसे अच्छी दूरी, दोनों की छाप घर में, लोग कहते हैं इनका घर बहुत सुंदर है। (3) तीसरी या ग्यारहवीं में: मित्र तत्व, पसंद अलग पर टकराती नहीं; एक को किताबें, दूसरे को संगीत, दोनों छूट देते हैं; दोस्ती वाली जोड़ी, साथ आसान; 3 और 11 बढ़ने वाले भाव हैं, विवाह के बाद बढ़त, साझा काम करें तो और। (4) आमने-सामने, सातवीं राशि में: सबसे ज्यादा खिंचाव, जो मुझमें नहीं वह सामने वाले में है; शुरुआत में सबसे ज्यादा प्रेम यही करते हैं, पर समय बीतते ही हर बात में लड़ाई; जैसे चोर साधु से प्रभावित होता है पर साधु बन नहीं पाता; उपाय एक ही, एक बार एक का चले, दूसरी बार दूसरे का। (5) दूसरी-बारहवीं, पड़ोसी राशियाँ: एक तरफा जोड़ी; जिसका शुक्र दूसरे से बारहवाँ है उसकी पसंद दूसरे का खर्च बन जाती है; प्यार है पर हिसाब में एक पलड़ा झुका हुआ। (6) चौथी-दसवीं, केंद्र: पसंद घर और काम में मिलती है, मन में नहीं; कर्तव्य में साथ, पर जो एक को मजा देगा वह दूसरे को काम लगेगा; टिकाऊ, ज्यादातर घरों में यही, पर रस की कमी। (7) छठी-आठवीं, षडाष्टक: विरोधी तत्व, कोई दृष्टि नहीं; यही जोड़ी कहती है हमारी पसंद कभी नहीं मिलती; झगड़ा बड़ी बात पर नहीं, हर छोटी पसंद पर रोज, और यही रिश्ते को थका देता है; पर टूटेगा नहीं, क्योंकि बात केवल शुक्र की है।
उपाय: षडाष्टक सबसे खराब है; समझ लेना ही उपाय है, बँटवारा ही रास्ता है। बाहर वाले को तय मत करने दीजिए: इस महीने तुम्हारी पसंद, अगले महीने मेरी। षडाष्टक वाले साझा पसंद की जिद छोड़ें, दो अलग कमरों की सजावट, दो अलग खर्च के खाते, और एक-दूसरे की पसंद पर टोका-टाकी बंद। दाम्पत्य न टूटे, बस विचार नहीं मिलता, इतना मान लेना ही सबसे जरूरी है।
0:00 बाजार, पर्दा और खर्च: पसंद क्यों नहीं मिलती
1:02 दोष स्वभाव का नहीं, एक ग्रह की दूरी का
2:02 नमस्कार: शुक्र, पसंद का साँचा
2:44 राशियों के रिश्ते: सम-सप्तक, नवम-पंचम, षडाष्टक
3:14 दूरी काम कैसे करती है: चार तत्व और उनकी मैत्री
4:03 जोड़ी 1: दोनों के शुक्र एक ही राशि में
4:35 एक जैसी पसंद की कमी: नयापन नहीं
5:41 जोड़ी 2: नवम-पंचम, सबसे अच्छी दूरी
7:23 जोड़ी 3: तीसरी-ग्यारहवीं, दोस्ती वाली जोड़ी
8:24 जोड़ी 4: आमने-सामने, सबसे ज्यादा खिंचाव
8:54 चोर और साधु: शुरू में प्रेम, फिर लड़ाई
9:56 आमने-सामने वालों का उपाय
10:10 जोड़ी 5: द्विर्द्वादश, एक तरफा जोड़ी
10:49 जोड़ी 6: चौथी-दसवीं, कर्तव्य साथ, आनंद अलग
11:54 जोड़ी 7: षडाष्टक, हर छोटी पसंद पर रोज झगड़ा
12:54 तीन उदाहरण: वृषभ-वृश्चिक, मेष-कन्या, मिथुन-कुंभ
13:54 घर में किसकी पसंद चलेगी: बली शुक्र
14:17 सार और उपाय: बँटवारा, बारी-बारी, अलग खाते
15:11 समापन
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