विनोद खन्ना: फ़िल्मों में लौटना आसान था・अमेरिका में गुरु को छोड़ना भारी
रील से रियल तक
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विनोद खन्ना: फ़िल्मों में लौटना आसान था・अमेरिका में गुरु को छोड़ना भारी
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उन्नीस सौ सत्तर के दशक में जब विनोद खन्ना का फ़िल्मी करियर अपने सबसे बड़े मुक़ाम पर था, तब उन्होंने अचानक परदे की दुनिया से मुँह मोड़कर हर किसी को चौंका दिया था। बाहर से देखने वालों के लिए सिनेमा छोड़ना ही सबसे बड़ा क़दम दिखाई दिया, मगर विनोद खन्ना के अपने शब्दों ने सालों बाद इस कहानी का पूरा रुख़ ही बदल दिया। उन्होंने साफ़ कहा था कि फ़िल्मों में वापस आना अपेक्षाकृत आसान था, लेकिन अमेरिका के उस आश्रम में अपने गुरु को छोड़ना उनके जीवन का सबसे कठिन फ़ैसला था।
यह पॉडकास्ट केवल एक मशहूर अभिनेता के संन्यास और वापसी का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह मानव मन के उस द्वंद्व की पड़ताल है जहाँ एक इंसान अपने ही चुने हुए रास्ते से बाहर निकलने की कशमकश से गुज़रता है। क्या किसी रास्ते से वापस लौट आना उस पुराने विश्वास को झूठा बना देता है? जब उन्नीस सौ सत्तासी में उन्होंने दोबारा कैमरे का सामना किया, तो क्या वह केवल काम की दुनिया में लौटना था या किसी गहरे आंतरिक अलगाव की खामोश शुरुआत?