माया और कपट से बचो | स्वयं को छलना छोड़ा तो जीवन की दिशा बदल जाएगी | युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी 22.08
AnandMahendraVani и CHAPLOT MEDIA CONCEPT
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माया और कपट से बचो | स्वयं को छलना छोड़ा तो जीवन की दिशा बदल जाएगी | युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी 22.08
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📿 आनंद अनुभूति वर्षावास — भीलवाड़ा 2026
📅 22 अगस्त 2026, शनिवार
📍 शांतिभवन, भीलवाड़ा
श्रमणसंघीय युवाचार्य प्रवर परम पूज्य श्री महेन्द्र ऋषिजी म.सा. ने शांतिभवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में माया, कपट, अहंकार, आत्मस्वीकार और विवेक पर गहन चिंतन प्रस्तुत करते हुए रावण के जीवन से अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिया—
🕉️ “माया ने रावण जैसे सामर्थ्यवान का भी विवेक छीन लिया, एक छल ने बदल दी जीवन की पूरी दिशा।”
पूज्य युवाचार्यश्री ने कहा कि रावण केवल बलशाली राजा नहीं था। वह ज्ञान, राजनीति, सामर्थ्य और दूरदृष्टि से सम्पन्न था। लेकिन माया के एक क्षण में उसने अपना वास्तविक स्वरूप छिपाया, साधु का वेश धारण किया और वहीं से उसके जीवन की दिशा बदल गई।
सामर्थ्य समाप्त नहीं हुआ था।
ज्ञान भी कम नहीं हुआ था।
लेकिन विवेक पर माया का आवरण पड़ गया था।
युवाचार्यश्री ने समझाया कि जीवन में पतन हमेशा सामर्थ्य की कमी से नहीं होता। कई बार सामर्थ्य होते हुए विवेक की एक चूक ही पर्याप्त होती है।
माया की सबसे बड़ी मार यही है—वह पहले सत्य से दूर करती है, फिर गलत निर्णय को भी सही साबित करने के तर्क देती है।
उन्होंने बताया कि कपट केवल झूठ बोलना नहीं है। अपनी गलती दूसरे पर डालना, दूसरे के गुण का श्रेय लेना, अपनी कमजोरी छिपाना या स्वयं को वह दिखाना जो वास्तव में हम नहीं हैं—यहीं से माया की शुरुआत होती है।
एक मुखौटे को बचाने के लिए दूसरा मुखौटा और दूसरे को बचाने के लिए तीसरा लगाना पड़े तो जीवन धीरे-धीरे सरलता खोकर बोझ बन जाता है।
पूज्य युवाचार्यश्री ने अहंकार को भी माया का सहयोगी बताते हुए कहा कि धन, ज्ञान, कुल, रूप, पद, प्रतिष्ठा या सामर्थ्य का मद मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर ले जाता है।
“मैं बड़ा हूं, मैं श्रेष्ठ हूं” का भाव जितना बढ़ता है, आत्मस्वरूप उतना पर्दों के पीछे चला जाता है।
नागश्री के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि भूल स्वयं की हो और बदनामी के भय से दोष किसी दूसरे पर डाल दिया जाए तो बाहर से वह छोटी चालाकी लग सकती है, लेकिन भीतर वही भाव कर्मबंधन को गहरा कर सकता है।
उन्होंने कहा—
“भूल स्वीकार करने से मनुष्य छोटा नहीं होता, उसे छिपाने के लिए किया गया कपट चरित्र को छोटा कर देता है।”
माया को क्रोध और अहंकार से भी अधिक सूक्ष्म बताते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि क्रोध चेहरा और वाणी बता देते हैं, अहंकार चाल और व्यवहार में दिखाई दे सकता है, लेकिन कपट अक्सर मिठास का मुखौटा पहनकर आता है।
सामने प्रशंसा और भीतर स्वार्थ, बाहर मधुरता और भीतर अलग योजना—यह दोहरापन सबसे पहले व्यक्ति को स्वयं से दूर करता है।
घी के घड़े और तलवार के प्रसंग से युवाचार्यश्री ने समझाया कि संसार में छल करने वाला अक्सर यह सोचकर प्रसन्न होता है कि उसने सामने वाले को मात दे दी, जबकि उसी क्षण वह स्वयं भी भीतर से हारना शुरू कर चुका होता है।
दूसरे को ठगकर मिली जीत वास्तव में स्वयं पर मिली हार हो सकती है।
धर्म के क्षेत्र में उन्होंने और अधिक सावधानी की प्रेरणा दी। धार्मिक वेश, प्रतीक, आराधना और धर्मसभा तभी सार्थक हैं जब भीतर का क्रोध, मान, माया और लोभ भी कम हो।
घर का बिखरा सामान तख्त के नीचे छिपाकर ऊपर साफ चादर बिछाने से कमरा बाहर से व्यवस्थित लग सकता है, लेकिन भीतर की अव्यवस्था समाप्त नहीं होती।
उसी प्रकार—
धार्मिक आवरण दुनिया से दोष छिपा सकता है, आत्मा से नहीं।
युवाचार्यश्री ने कहा कि माया से एक बार काम निकल सकता है, लेकिन जीवन नहीं संवरता। वर्षों में कमाई प्रतिष्ठा भी कभी-कभी एक गलत निर्णय से धूमिल हो जाती है।
माया से बचने का मार्ग कठिन नहीं, लेकिन साहस मांगता है—
गलती अपनी है तो स्वीकार करें।
गुण दूसरे का है तो उसका सम्मान करें।
जो भीतर नहीं है, उसे बाहर दिखाने के लिए मुखौटे न बनाएं।
और सबसे महत्वपूर्ण—
“जिस दिन मनुष्य स्वयं को छलना छोड़ दे, उसी दिन भीतर की यात्रा सही दिशा पकड़ लेती है।”
✨ प्रवचन के प्रमुख संदेश
• माया सामर्थ्यवान व्यक्ति का भी विवेक छीन सकती है।
• पतन के लिए हमेशा कमजोरी जरूरी नहीं; एक गलत निर्णय भी पर्याप्त हो सकता है।
• स्वयं का वास्तविक स्वरूप छिपाना कपट की शुरुआत है।
• गलती का दोष दूसरे पर डालना माया है।
• दूसरे के गुण का श्रेय स्वयं लेना भी कपट है।
• अहंकार माया को बढ़ने का अवसर देता है।
• कपट अक्सर मधुर व्यवहार के भीतर छिपा होता है।
• एक झूठ को बचाने के लिए कई नए आवरण बनाने पड़ते हैं।
• धार्मिक दिखना और भीतर कषाय रखना आत्मसाधना नहीं है।
• भूल स्वीकार करना कमजोरी नहीं, आत्मबल है।
• माया संसार को भ्रमित कर सकती है, आत्मा को नहीं।
• वास्तविक शांति मुखौटे बढ़ाने में नहीं, उन्हें हटाने में है।
🙏 आइए, अपने जीवन में सत्य, सरलता और आत्मस्वीकार का पुरुषार्थ करें। दूसरों के सामने अच्छा दिखने से पहले स्वयं के सामने सच्चा बनने का संकल्प लें।
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