"क्या पता कल राम बनकर लौट आऊं..." | पवन प्रगीत | के.सी.लिटरेचर | लफ़्ज़ - घर के वास्ते
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"क्या पता कल राम बनकर लौट आऊं..." | पवन प्रगीत | के.सी.लिटरेचर | लफ़्ज़ - घर के वास्ते
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"इस समय वनवास मेरा चल रहा है,
क्या पता कल राम बनकर लौट आऊं..."
"अगन है धुंआ है यह देखा नहीं था,
मोहब्बत जुआ है यह देखा नहीं था...
तुम्हारी बताई डगर पर चला हूं,
नहर है कुआं है यह देखा नहीं था।"
लखनऊ के मंच पर कवि पवन प्रगीत का यह बेहद भावुक और प्रेरणादायक गीत सुनिए। अपने अनोखे अंदाज और मीठे सुरों में जब उन्होंने "इस समय वनवास मेरा चल रहा है, क्या पता कल राम बनकर लौट आऊं" और "अगन है धुंआ है यह देखा नहीं था" गाया, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
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