परशुराम राम लक्ष्मण संवाद रामलीला अगई
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परशुराम राम लक्ष्मण संवाद रामलीला अगई
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राम-लक्ष राम-लष्मष्मण-परशुराम सवाद
देखत भगृपुति बेष कर
ु ाला। उठे सकल भय बिकल भआल ु ा॥
पित समेत क ु हि कहि निज नामा। लगे करन सब दड प्रन ं ामा॥
जेहि सभुायँ चितवहिं हितुजानी। सो जानइ जन आइ ख ु टा
ु नी॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनाम कर
ु ावा॥
आसिष दीन््हहि सखीीं हरषानीीं। निज समाज लै गइ सयानीीं॥
बिस््ववामित्रु मिले पनिु आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥
राम लखन ु ु दसरथ के ढोटा। दीन््हहि असीस देखि भल जोटा।।
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।।
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।
पछत ज ू ानि अजान जिमि ब््ययापेउ कोप सरीसमाचार कहि जनक सनुाए। जेहि कारन महीप सब आए॥
सनत बचन
ु फिरि अनत निहारे। देखे चापखड म ं हि डारे॥
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनष कै तोर
ु ा॥
बेगि देखाउ मढ़ न त आज ू ।
ू उलटउँ महि जहँ लहि तव राज॥
ू
अति डरु उतरु देत नपृ नु ाहीीं। कुटिल भप हरषे मन म ू ाहीीं॥
सर म ु निु नाग नगर नर नारी। सोचहि सकल त् ं रास उर भारी॥
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भगृपुति कर सभुाउ सनिु सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघबीरु॥ ु
नाथ सं
भधनु भ ु जं निहारा। होइहि के उ एक दास तम्
ु्हहारा॥
आयस कु ाह कहिअ किन मोही। सनिु रिसाइ बोले मनिु कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सनहु ु राम जेहि स ं िवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहि सब ं राजा॥
सनिु मनिु बचन लखन मसुकुाने। बोले परसधर
ु हि अपमाने॥
बहु धनहीुीं तोरीीं लरिकाइ। कबहुँ न असि रिस कीन््हहि गोसाइ॥
एहि धन पर ममत ु ा केहि हेत।
ू सनिु रिसाइ कह भगृ कुुलके त॥ू
रे नप ब ृ ालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनही सम
ु तिपर
ुारि धनु बिदित सकल सं
सार॥
रामचरितमानस मेें यहाँ से आगे की कथा मेें परशराम
ु का आक्रोश, लक्ष्मण और परशराम के
ु
बीच व््ययंग््ययोक्तिपर्ू्ण सं
वाद और ऐसी स््थथिति मेें भी राम के धीर-गं
भीर शां
त स्वरूप का वर््णन
है। अतत: राम के विनय और विश् ं ्ववामित्र के समझाने पर तथा राम की शक्ति की परीक्षा लेकर
परशराम का आक् ु रोश शां
त होता है।
राम-लक्ष्मण-परशराम स ु ं
वाद आप प्रश्न-अभ््ययास मेें ‘खोजबीन’ के अतं र््गत दिए गए लिं
क
के माध्यम से पढ़ सकते हैैं।