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शाही दादा और संघर्षरत रफ़ी साहब......... फिर हुआ कमाल l mohammed rafi, sd burman

golden era of legends

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शाही दादा और संघर्षरत रफ़ी साहब......... फिर हुआ कमाल l mohammed rafi, sd burman

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#mohammedrafi #rafisahab #rafisongs #sdburman #devanand #latamangeshkarsongs #trending #oldisgoldsongs #oldhindisongs “शाही दादा और संघर्षरत रफ़ी साहब… फिर हुआ कमाल!” हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर में कुछ जोड़ियाँ ऐसी बनीं, जिन्होंने सिर्फ गीतों को लोकप्रिय नहीं बनाया, बल्कि संगीत की पूरी भाषा को नया आयाम दिया। सचिन देव बर्मन और मोहम्मद रफ़ी की जोड़ी भी ऐसी ही एक अनोखी साझेदारी थी। एक तरफ त्रिपुरा के राजघराने से आने वाले एस.डी. बर्मन, जिन्हें प्यार से दादा कहा जाता था; दूसरी तरफ लाहौर से मुंबई पहुँचे मोहम्मद रफ़ी, जिनके पास दौलत या विरासत नहीं, सिर्फ आवाज़ और उसे साबित करने का जुनून था। दोनों की पृष्ठभूमि भले ही बिल्कुल अलग थी, लेकिन संगीत के प्रति समर्पण ने उन्हें एक-दूसरे के करीब ला दिया। शुरुआती दौर में दोनों ने साथ काम किया, लेकिन ‘प्यासा’ के बाद दादा बर्मन ने रफ़ी की आवाज़ की असाधारण क्षमता को एक नए नजरिए से पहचाना। रफ़ी साहब ऊँचे सुरों तक आसानी से पहुँच सकते थे, लेकिन उनकी आवाज़ की नर्मी और मिठास भी बरकरार रहती थी। यही स्वर की लोच और अद्भुत मॉड्यूलेशन उन्हें दादा की जटिल धुनों के लिए बेहद खास बनाता था। इसके बाद ‘काला पानी’ जैसे गीतों ने इस साझेदारी को और मजबूत कर दिया। फिर आया ‘काला बाज़ार’ का ‘खोया-खोया चाँद’। कहा जाता है कि गीतकार शैलेंद्र समय पर गीत के बोल नहीं लिख पा रहे थे। दादा बर्मन ने आर.डी. बर्मन यानी पंचम को उनके साथ भेज दिया। दिनभर मुंबई की सड़कों पर घूमने के बाद जुहू के किनारे चाँद को देखकर शैलेंद्र को अचानक गीत के बोल सूझे और उन्होंने उन्हें कागज के एक टुकड़े पर लिख दिया। यही छोटा-सा कागज आगे चलकर हिंदी फिल्म संगीत के यादगार गीतों में से एक का आधार बना। दादा बर्मन का प्रयोग सिर्फ धुनों तक सीमित नहीं था। ‘अपनी तो हर आह’ जैसे गीतों में उन्होंने ध्वनि का भी अद्भुत इस्तेमाल किया। ट्रेन की सीटी का प्रभाव पैदा करने के लिए बाँसुरी की आवाज़ का प्रयोग उनकी रचनात्मकता का शानदार उदाहरण माना जाता है। इसके बाद ‘नौ दो ग्यारह’, ‘सोलवां साल’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘गाइड’, ‘तीन देवियां’ और ‘तलाश’ जैसी फिल्मों ने रफ़ी और बर्मन की साझेदारी को यादगार बना दिया। इस रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात यही थी कि यहाँ एक तरफ संगीतकार की पारखी नजर थी और दूसरी तरफ गायक की ऐसी आवाज़, जो हर धुन के साथ अपना रंग बदल सकती थी। एस.डी. बर्मन और मोहम्मद रफ़ी—दो अलग दुनिया से निकले दो फनकार, लेकिन संगीत के आकाश में दोनों की चमक एक ही थी। और शायद यही वजह है कि दशकों बाद भी जब रफ़ी साहब की आवाज़ में दादा बर्मन की धुन सुनाई देती है, तो लगता है—सुरों का वह जादू आज भी जिंदा है।