प्रयागराज का ऐतिहासिक दाधिकांतों मेला । TELIYARGANJ । VLOG । VLOGGER🤳🏼📸
DHANANJAY EXPLORER
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प्रयागराज का ऐतिहासिक दाधिकांतों मेला । TELIYARGANJ । VLOG । VLOGGER🤳🏼📸
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प्रयागराज के दधिकांदो मेले का इतिहास सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत और देशभक्ति की एक गहरी गाथा समेटे हुए है। आइए इसके इतिहास और तेलियरगंज-रसूलाबाद क्षेत्र से इसके जुड़ाव को थोड़ा और गहराई से समझते हैं।
1. मेले की नींव और क्रांतिकारी इतिहास (1890)
• शुरुआत और संस्थापक: इस ऐतिहासिक मेले की शुरुआत 1890 में तीर्थ पुरोहित रामकैलाश पाठक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विजय चंद्र और सुमित्रा देवी ने की थी।
• अंग्रेजों को सीधी चुनौती: उन दिनों प्रयागराज का सलोरी, तेलियरगंज, सुलेमसराय और कीडगंज का इलाका ब्रिटिश कैंटोनमेंट (सैन्य क्षेत्र) के अंतर्गत आता था। यहां अंग्रेजों का कड़ा पहरा और खौफ रहता था। अकेले या छोटे समूहों में कोई भी आयोजन करने की मनाही थी।
• रणनीतिक ताना-बाना: स्वतंत्रता सेनानियों ने आम जनमानस को एकजुट करने और उनके दिलों से अंग्रेजों का डर निकालने के लिए 'धार्मिक आयोजन' को एक हथियार बनाया।
जिस तरह महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को जोड़ने के लिए गणेश उत्सव की शुरुआत की थी, ठीक उसी तर्ज पर प्रयागराज में क्रांतिकारियों ने दधिकांदो मेले को माध्यम बनाया।
2. ब्रिटिश पाबंदियां और जनता का विद्रोह
• मेले पर प्रतिबंध: इस मेले के जरिए जब लोग एकजुट होने लगे और देशभक्ति की भावना सुलगने लगी, तो ब्रिटिश सरकार घबरा गई। अंग्रेजों ने 1922 और 1927 में इस मेले पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।
• परंपरा की जीत: प्रतिबंध के बावजूद स्थानीय लोगों और क्रांतिकारियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने छुपकर और डटकर अंग्रेजों की लाठियों और बंदूकों का सामना करते हुए भगवान कृष्ण-बलदाऊ की सवारी निकाली और इस परंपरा को जीवित रखा।
3. तेलियरगंज और कैंट क्षेत्रों का विशेष महत्व
• चूंकि तेलियरगंज और रसूलाबाद सीधे तौर पर ब्रिटिश सेना के प्रभाव वाले क्षेत्रों के करीब थे, इसलिए यहाँ मेला आयोजित करना सीधे तौर पर 'बगावत' माना जाता था।
• शुरुआती दौर में कोई भव्य गाजे-बाजे नहीं होते थे। मशालों और लालटेन की मद्धम रोशनी में क्रांतिकारी और स्थानीय लोग भगवान की चौकियां (झांकियां) अपने कंधों पर उठाकर चलते थे।
जयकारों के बीच गुप्त संदेशों और आजादी की रणनीतियों का आदान-प्रदान इसी मेले की भीड़ में हुआ करता था।
4. समय के साथ स्वरूप में बदलाव (मशाल से चांदी के हौदे तक)
• 1960 का दशक: मशाल और लालटेन की जगह धीरे-धीरे पेट्रोमैक्स और शुरुआती बिजली की झालरों ने ले ली।
• 1970-80 का दशक: जो मूर्तियां पहले भक्तों के कंधों पर चलती थीं, वे अब हाथी और चांदी के हौदे (राजसी सीट) पर सजकर निकलने लगीं।
• वर्तमान स्वरूप (2026): अब तेलियरगंज के दधिकांदो मेले में आधुनिक लेजर लाइट्स, विशाल डीजे कॉम्पिटिशन और सामाजिक संदेश देने वाली डिजिटल झांकियां निकाली जाती हैं।
धार्मिक आस्था के साथ-साथ यह मेला आज भी प्रयागराज की 'गंगा-जमुनी तहजीब' और आपसी भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
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