पार्वती–गणेश–शंकर का असली रहस्य |
सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
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पार्वती–गणेश–शंकर का असली रहस्य |
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सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
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मन की शंकर अवस्था गणेश अवस्था पर्वतीय अवस्था कार्तिकेय अवस्था का अगला भाग
जब बाहरी यात्राऐं समाप्त होती है, वहीं से भीतर की बेहद की यात्रा आरम्भ होती है
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मां पार्वती की झलकी हमें एक अत्यन्त गहरा योग-संदेश देती है।
पार्वती — ***आत्मा की वह शक्ति है जो अपने देह-अभिमान को पहचानकर उससे अलग होना सीखती है**मिट्टी उतरकर बाहर रख देना,
मिट्टी का बना यह तन हमारा साधन है, हमारी पहचान का अन्तिम सत्य नहीं। इसलिए पार्वती का अपने तनरूपी वस्त्र को उतारकर बाहर रखना इस बात का संकेत है गहरा इशारा है कि—
“मैं यह शरीर नहीं; मैं इस शरीर में रहने वाली अविनाशी आत्मा हूँ।”श्री जी हूं
यहाँ वस्त्र उतारना शरीर छोड़ना नहीं, बल्कि शरीर की पहचान से ऊपर उठना है।
इसी देह-अभिमान और उससे जुड़ी हुई पुरानी संस्कार-मैल को बाहर रखने की झलकी को गणेश के रूप में दिखाया गया है। गणेश अर्थात् ऐसी विवेकी बुद्धि जो भीतर के विघ्नों को पहचानकर उनका विनाश करने की क्षमता प्राप्त करती है।
फिर आता है शंकर।
शंकर का त्रिशूल किसी देह को नष्ट करने का अस्त्र नहीं—
यह तो तीन धाराओं पर विजय का प्रतीक है:
👉देह-अभिमान, अहंकार और ममत्व।
जब इनकी पकड़ ढीली पड़ती है, तब आत्मा भीतर से हल्की होने लगती है।यू
इसीलिए कृष्ण की गोपियों के वस्त्र हरने की कथा हो या शंकर द्वारा वस्त्र खंडित करने की झलकी—इन्हें बाहरी घटना मानकर देखने से रहस्य छूट जाता है। वस्त्र यहाँ👉 देह की पहचान का प्रतीक है।
🌸 नग्नता का अर्थ
पार्वती का काली रूप धारण करना भी शरीर-विनाश का संदेश नहीं है।
काली अर्थात् काल और विकारों पर प्रचण्ड विजय की ज्वाला
मुंडों की माला—कटे हुए सिर—उन विचारों, अहंकारों और पुरानी पहचानाओं का प्रतीक हैं जिन्हें योग की अग्नि में समाप्त किया गया।
सिर अहंकार का प्रतीक है।
जब “मैं देह हूँ”, “मैं करता हूँ”, “यह मेरा है”—ये धारणाएँ गिरती हैं, तब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होती है।
यही है—
अन्तर्मुखी बनना।
साक्षी बनना।
निरहंकारी बनना।
अखंड योग में स्थित होना।
इस अध्याय का मूल रहस्य देह-अभिमान से आत्म-अभिमानी बनना, आज इतना ही हर हर महादेव सत्यमेव जयते