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प्रभु पतित पावन | दर्शन स्तुति | कविश्री बुधजन जी कृत भावपूर्ण जैन भक्ति स्तुति

Jinbhakt

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प्रभु पतित पावन | दर्शन स्तुति | कविश्री बुधजन जी कृत भावपूर्ण जैन भक्ति स्तुति

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Jinbhakt
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🙏 जय जिनेन्द्र 🙏 वीतराग प्रभु की महिमा का गुणगान करती यह भावपूर्ण “प्रभु पतित पावन - दर्शन स्तुति” जैन भक्तिकाव्य की अमूल्य रचनाओं में से एक है। कविश्री बुधजन जी द्वारा रचित यह स्तुति आत्मा की विनम्र प्रार्थना, प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण और सम्यग्दर्शन की महिमा को अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है। इस स्तुति में जीव अपनी भूलों, मिथ्यात्व, मोह और कर्मबंधन को स्वीकार करते हुए प्रभु के चरणों में शरण ग्रहण करता है। वीतराग जिनेन्द्र भगवान के दर्शन से आत्मा में ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है, मिथ्यात्व का अंधकार दूर होता है और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा प्राप्त होती है। यह रचना केवल स्तुति नहीं, बल्कि आत्मजागरण, समर्पण और जिनभक्ति की दिव्य साधना है। 📜 Lyrics: प्रभु पतित-पावन मैं अपावन, चरण आयो सरन जी। यो विरद आप निहार स्वामी, मेटो जामन मरन जी॥१॥ तुम ना पिछान्या आन मान्या, देव विविध प्रकार जी। या बुद्धि सेती निज न जान्यो, भ्रम गिन्या हितकार जी॥२॥ भव-विकट-वन में कर्म-वैरी, ज्ञानधन मेरो हर्यो। सब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होय, अनिष्ट-गति धरतो फिर्यो॥३॥ धन घड़ी यो धन दिवस यो ही, धन जनम मेरो भयो। अब भाग मेरो उदय आयो, दरश प्रभु को लख लयो॥४॥ छवि वीतरागी नग्न मुद्रा, दृष्टि नासा पे धरे। वसु प्रातिहार्य अनंत गुणजुत, कोटि रवि छवि को हरें॥५॥ मिट गयो तिमिर मिथ्यात्व मेरो, उदय रवि आतम भयो। मो उर हरष ऐसो भयो, मनु रंक चिंतामणि लह्यो॥६॥ मैं हाथ जोड़ नवाय मस्तक, वीनऊँ तुव चरन जी। सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन, सुनहु तारण तरण जी॥७॥ जाचूँ नहीं सुर-वास पुनि, नर-राज परिजन साथ जी। ‘बुध’ जाचहूँ तुव भक्ति भव भव, दीजिए शिवनाथजी॥८॥ 🙏 यदि यह प्रस्तुति आपको पसंद आए तो वीडियो को LIKE, SHARE और COMMENT अवश्य करें तथा JinBhakt चैनल को SUBSCRIBE करना न भूलें। #PrabhuPatitPavan #BudhjanJi #JainBhakti #JainStuti #Jainism #DigambarJain #JinBhakt #JainDevotional #JainSongs #JinendraBhakti #VitragBhakti #SamyakDarshan #JainDharma #JainCulture #JaiJinendra #BhaktiGeet #JainSpirituality #AtmaJagran #JainStotra #DevotionalSong