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तू भाये तेरी प्रीति न भाये पिय|Tu Bhaye Teri Preti na bhaye piya|Prem Ras Madira Jagadguru Kripaluji

Body-Mind-Soul Healing at Natura-Inland

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तू भाये तेरी प्रीति न भाये पिय|Tu Bhaye Teri Preti na bhaye piya|Prem Ras Madira Jagadguru Kripaluji

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Body-Mind-Soul Healing at Natura-Inland
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तू भाये तेरी प्रीति न भाये पिय । हे प्रियतम श्यामसुन्दर ! तुम तो मुझे बहुत अच्छे लगते हो किन्तु तुम्हारा प्यार बिलकुल अच्छा नहीं लगता । अंग-अंग छवि कोटि अनंगनि,लोचन पुनि पुनि लखि न अघाये पिय । तुम्हारे एक-एक अंग के सौंदर्य पर अनन्त कामदेव का सौंदर्य निछावर है। आँख बार-बार देखकर भी तृप्त नहीं होती। चितवनि मधुर-मधुर मृदु मुसकनि,कोटिन प्रान वारि सुख पाये पिय । तुम्हारी मधुर विलोकनि एवं मधुर-मुसकान को देखकर तो इतना सुख मिलता है कि करोड़ों प्राण न्यौछावर कर देती हूँ। मत्त-गजेन्द्र गवनि का कहनो,लखतहिं बनत न बनत बताये पिय । बनैले मतवाले हाथी के समान तुम्हारी मतवाली चाल का तो कहना ही क्या है । बस देखते ही बनती है, बताई नहीं जाती। भूलत प्रान अपान तान सुनि,मुरली अधर-धर जबहिं बजाये पिय । और जब तुम मनोहर मुरली को अधर पर धर कर बजाते हो तब उस सुरीली तान को सुन कर प्राण-अपान की सुध-भूल जाती है। पै 'कृपालु' जब तुम कहि "प्यारी”, उर लगाय यह समुझि न आये पिय ।। 'कृपालु' कहते हैं कि यह सब तो ठीक है किन्तु जब तुम मार्ग में "प्यारी कह कर बेधड़क हृदय से लगा लेते हो, यह तुम्हारा लोक-विरुद्ध व्यवहार समझ में नहीं आता। Prem Ras Madira-Prakirna Madhuri