लूट सके तो लूट ले | राम नाम की लूट | कबीर भजन | Kabir Bhajan | Free Human Soul
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भजन: राम नाम की लूट
संत वाणी: कबीर साहेब
शैली: निर्गुण भजन | आध्यात्मिक लोक-भजन
भाव: आत्म-साक्षात्कार | भक्ति | ध्यान | आत्मज्ञान
Voice: Artificially Modulated
“लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट॥”
कबीर साहेब के इन गहरे आध्यात्मिक वचनों पर आधारित यह भक्ति प्रस्तुति हमें जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई की याद दिलाती है। संसार की दौड़, धन, मोह, माया, इच्छाओं और सांसारिक कामों में मनुष्य अपना जीवन व्यतीत कर देता है, लेकिन अंत में जब जीवन समाप्त होने का समय आता है, तब पछताने के लिए समय नहीं बचता।
इस भजन का संदेश है कि भगवान के नाम का स्मरण किसी भविष्य के लिए टालने की चीज नहीं है। जीवन रहते ही अपने भीतर जागना है, अपने मन को समझना है और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना है।
कबीर कहते हैं कि केवल बाहरी माला फेरने से हरि की प्राप्ति नहीं होती, सच्ची माला तो मन की है। जैसे माली धैर्य के साथ पौधे को सींचता है और ऋतु आने पर उसमें फल लगते हैं, वैसे ही आध्यात्मिक साधना में भी धैर्य, प्रेम और निरंतरता आवश्यक है।
इस प्रस्तुति में कबीर के कई प्रसिद्ध और गहरे दोहों के माध्यम से जीवन के अलग-अलग पक्षों को छुआ गया है।
“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।”
“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।”
“दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार।”
“आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।”
और अंत में एक बहुत गहरा प्रश्न सामने आता है:
“आया था किस काम को, तु सोया चादर तान।
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान॥”
हम इस संसार में किस उद्देश्य से आए हैं?
क्या हमारा पूरा जीवन केवल संसार की दौड़ में बीत जाना चाहिए?
क्या हम अपने भीतर झाँकने और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए समय निकालते हैं?
यह भजन उसी जागरण का एक सरल स्मरण है।
*Free Human Soul* पर हमारा प्रयास है कि संतों की वाणी, कबीर के दोहे, निर्गुण भजन और भारतीय आध्यात्मिक विचारों को सरल और भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया जाए।
यदि यह भजन आपके मन को छूता है, तो इसे ध्यान से सुनें, इसके शब्दों पर मनन करें और अपने प्रियजनों के साथ साझा करें।
भजन: लूट सके तो लूट ले
संत: कबीर साहेब
प्रस्तुति: Free Human Soul
शैली:कबीर भजन, निर्गुण भक्ति, राम नाम, संत वाणी
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