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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 05 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |

Swami Akhandanand Saraswati By Anand Prastuti

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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 05 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |

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Swami Akhandanand Saraswati By Anand Prastuti
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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 05 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |    • माण्डूक्यकारिका - अद्वैत  प्रकरण - 05     ...   परम पूज्य महाराजश्री द्वारा इस प्रवचन में माण्डूक्यकारिका के अद्वैत प्रकरण पर गहन चर्चा की गई है। मुख्य बिंदु - 🔸1. आत्मा का ज्ञान स्वरूप (01:06 - 01:44): परम पूज्य महाराजश्री जी बताते हैं कि आत्मा 'ज्ञान स्वरूप' है। वह कोई जानने या जानने वाला विषय नहीं है, बल्कि वह स्वयं साक्षी और चैतन्य है । 🔸2 .सुख-दुख बुद्धि का धर्म है (02:20 - 03:15): सुख और दुख आत्मा के धर्म नहीं हैं, बल्कि ये बुद्धि (अंतःकरण) के विकार हैं। जब हम अपने आप को बुद्धि के साथ जोड़ लेते हैं (तादात्म्य), तब हम सुखी या दुखी महसूस करते हैं । 🔸3 .मन की आदतें (08:30 - 09:15): परम पूज्य महाराजश्री एक दृष्टांत देते हैं कि जैसे चींटी शक्कर ढूंढती है और गोबरौला गंदगी, वैसे ही मन का स्वभाव है कि वह दुखी होने का आदी है तो दुख ढूँढ लेता है। हमें अपने मन को चींटी की तरह सुख-दृष्टि वाला बनाना चाहिए । 🔸 4 .बंधन और मोक्ष (23:33 - 23:55): बद्ध और मुक्त होने की कल्पना केवल बुद्धि में होती है। आत्मा अद्वैत, नित्य और असंग है; उसमें न कोई बंधन है और न ही कोई मोक्ष । 🔸5 .उपाधि का अर्थ (18:02 - 19:10): बाहर से मिलने वाली उपाधियां जैसे मान-सम्मान या डिग्री, आत्मा का स्वरूप नहीं हैं। आत्मा इन उपाधियों से परे है । 🔸6 . सांख्य और वेदांत का समन्वय (26:15 - 28:00): सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति के संबंध की जो चर्चा है, उसे परम पूज्य महारजश्री ने विवेक के माध्यम से स्पष्ट किया है कि अंततः सब कुछ चैतन्य आत्मा की सत्ता से ही प्रकाशित होता है। 🔸7 . अविवेक का त्याग (58:20 - 1:00:06): अंत में परम पूज्य महारजश्री कहते हैं कि पाप-पुण्य, राग-द्वेष और सुख-दुख के साथ आत्मा का कोई संबंध स्वीकार न करना ही वास्तविक अद्वैत ज्ञान है। यह सिद्धांत किसी भी संप्रदाय या मजहब से ऊपर और क्रांतिकारी है। #swamiakhandanandsaraswati #mandukyaadvaitprakaran #anandprastuti #satsang #anandvrindavanashram