सातू आठू पर्व उत्तराखंड का पावन त्यौहार देवभूमि उत्तराखंड
Lalit Pant
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सातू आठू पर्व उत्तराखंड का पावन त्यौहार देवभूमि उत्तराखंड
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अष्टमी को - वैसे ही महेश्वर / मैसर की आकृति बनती है। शाम को गांव के चौक में गौरा-महेश्वर को डलिया में रख कर बिरूड़, धतूरे के फूल और काफल, नारंगी, नाशपाती चढ़ा कर पूजा होती है।
और सबसे प्यारा रिवाज - हीरे-मोती लुकाना! महिलाएं बिरूड़ के दानों को थाली में रख आंचल से ढकती हैं, ननदें उन्हें छुपाती हैं और भाभियां ढूंढती हैं। फिर उन दानों को पिछौड़े में लेकर उछाला जाता है, अगर कुंवारी लड़की के आंचल में गिरे तो जल्दी शादी का शगुन माना जाता है।
लोकगीत - आत्मा है इस पर्व की - 6:00 - 7:30]
इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता है इसमें गाई जाने वाली गौरा-महेश्वर की गाथा, जिसमें शिव-पार्वती के विवाह से लेकर गणेश जन्म तक के प्रसंग हैं।
गीतों में पूरा हिमालय जीवित हो उठता है।
जैसे -
नदि का किनार लौलि गोवा चराली, नदी पार मैसर गुसैं बाकरा चराला
यहाँ मैसर बकरी चरा रहा है, एक आम किसान की तरह।
और वो प्रसिद्ध गीत -
उपजी गवरा हिमाचली देशा, ल्याओ चेलियो कुकुड़ी का फूला...
गौरा जब मायके आती है तो चीड़, बांज, हिसालू, किलमोड़ी, नींबू, नारंगी सबसे रास्ता पूछती है। सब उसकी मदद करते हैं, सिवाय चीड़ के। इसलिए गौरा चीड़ को श्राप भी देती है। इसमें हमारे पुरखों का पर्यावरण ज्ञान भी छुपा है - बांज, देवदार पानी रोकते हैं, चीड़ नहीं।
भावुक विदाई - 7:30 - 8:30]
4-5 दिन बाद विसर्जन होता है। टोकरी में गौरा-महेश्वर को सर पर रख कर धारे या नौले में विसर्जित किया जाता है। विदाई इतनी भावुक होती है कि महिलाओं की आंखों में आंसू आ जाते हैं, जैसे सच में अपनी बेटी को विदा कर रही हों। और फिर सब कहते हैं - "तेरी सेवा पुरि भै केदार, अगले बरस फिर आना।"
तो दोस्तों, ये था हमारा सातू-आठू, गमरा-मैसर। अगर आपने भी गंगोलीहाट, पिथौरागढ़ में ये पर्व देखा है, तो कमेंट में जरूर लिखना - आपने बिरूड़ खाया क्या?
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