जनाब इस्लाम मेवाती साहब की यह कहानी भी उसी विरासत की एक कड़ी है। उनके पूर्वजों का मूल गाँव रायसीना,
Meo Migration
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🕊️ एक गाँव छूटा… एक सफ़र शुरू हुआ
मेवात की मिट्टी से निकली हिजरत की कहानियाँ सिर्फ़ जगह बदलने की दास्तान नहीं हैं, बल्कि यह अपनी जड़ों, पहचान और पुरखों की विरासत को अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने का सिलसिला है।
जनाब इस्लाम मेवाती साहब की यह कहानी भी उसी विरासत की एक कड़ी है। उनके पूर्वजों का मूल गाँव रायसीना, दिल्ली रहा और आज उनका बसेरा हापुड़, उत्तर प्रदेश में है। समय बदला, ठिकाने बदले, मगर अपनी मेवाती पहचान और अपनी जड़ों से जुड़ाव कायम रहा।
हिजरत इंसान को अपनी जन्मभूमि से दूर कर सकती है, लेकिन यादों को नहीं मिटा सकती।
पुरखों की मिट्टी, गाँव की गलियाँ, रिश्तों की यादें और अपनी पहचान—ये सब इंसान के दिल में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
रायसीना — इतिहास की ज़मीन
देहंगल — मेवाती पहचान
हापुड़ — आज का मुकाम
यही तो हिजरत की असली दास्तान है—
“जगह बदल गई, मगर जड़ें नहीं बदलीं।”
MEo Migration — हिजरत की दास्ताँ
हम उन परिवारों की कहानियाँ सामने ला रहे हैं, जिन्होंने कभी मेवात से सफ़र शुरू किया और आज देश के अलग-अलग हिस्सों में रहते हुए भी अपनी जड़ों को दिल से संभालकर रखा है।
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