प्रथमाचार्य श्री धर्मचन्द्रदेव जी महाराज की 102वीं जन्मजयंती के पावन उपलक्ष्य में अमृतवाणी
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अनन्त श्री प्रथम परम्परा सद्गुरु धर्मचन्द्रदेव जी महाराज की 102वीं पावन जन्मजयंती के उपलक्ष्य में
अनन्त श्री सद्गुरु आचार्य स्वतंत्रदेव जी महाराज की अमृतवाणी :
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अनन्त श्री प्रथम परम्परा सद्गुरु धर्मचन्द्र देव जी महाराज - एक संक्षिप्त परिचय
आचार्य श्री धर्मचन्द्र देव जी महाराज का अवतरण बलिया जिले के पकड़ी गाव में सद्गुरु महर्षि सदाफलदेव देव जी महाराज और पूज्यनीय माता श्री विमला देवी के यहाँ फाल्गुन कृष्ण त्रयोदसी महाशिवरात्रि २८ फ़रवरी १९१९ दिन शुक्रवार दो बजे दिन में हुआ था । उस समय बाबा स्कम्भ मुनि और महारानी मुक्ति देवी जीवित थे और उनको अपर हर्ष हुआ था । इस अवसर पर पकड़ी गाव में कई दिनों तक हर्षोल्लास के साथ पुत्रोत्सव मनाया गया था । अवतरण के समय ही आचार्य जी के मुखारविंद पर इतना तेज था, जिसके कारण उनका नामकरण धर्मचन्द्र देव जी रखा गया था । जिस दिन प्रथम परम्परा सद्गुरुदेव के इस धरा धाम पर आविर्भाव हुआ, उस दिन अध्यात्म मार्तण्ड महर्षि सदाफलदेव जी महाराज ने अपनी डायरी में लिखा - "आज एक योगी प्रकट हुआ है" । उनकी शिक्षा की व्यवस्था स्वामी जी ने वृत्तिकुट आश्रम पर ही किये थे । बाबा स्कम्भ मुनि और महारानी मुक्ति देवी की छत्रछाया में उनका पालन पोषण होता रहा । आप स्वामी जी के एक मात्र पुत्र थे । आप अल्पकाल में ही वैदिक साहित्य और संतमत के समस्त ज्ञान अर्जित कर लिए । आप हजारों वैदिक मंत्रों को कंठस्थ कर लिए थे । आप का बाल्यकाल ऋषि परम्परा के अनुसार व्यतीत हुआ । आप हिंदी, संस्कृत और उर्दू तीनों भाषाओं के जानकर थे । जब आप की अवस्था १२ वर्ष की हुयी, तो आप के विवाह के लिए अनेक जगहों से प्रस्ताव आने लगे । उस समय बलिया जिले के गढ़वार निवासी बाबू शिवपूजन सिंह स्वामी जी के परिचित थे और आर्य समाज के प्रसिद्द प्रचारक थे,स्वतंत्रता सेनानी थे, साथ ही वे भी जेल यात्रा कर चुके थे । समय के अनुसार बाबू शिवपूजन सिंह स्वामी जी के पास आचार्य श्री के विवाह का प्रस्ताव रखे । स्वामी जी उस प्रस्ताव को मान लिया और आचार्य श्री का पाणिग्रहण शिवपूजन बाबू के सुपुत्री सूश्री कमला देवी के साथ सन १९३१ में हो गया । आचार्य श्री के विवाह के समय बाबा स्कम्भ मुनि भी इस धरा धाम पर थे । धीरे–धीरे आचार्य श्री स्वामी जी के पत्रों को पढ़ना और उत्तर देना, स्वामी जी की हस्तलिखित पुस्तकों की पाण्डुलिपि तैयार करना, आश्रम पर आये जिज्ञासुओं के जिज्ञासा का समाधान करना और उसके बाद जिज्ञासूओं का उपदेश ले लेना चलता रहा । जब प्रथम आचार्य श्री की अवस्था १९ वर्ष की हुयी उस समय १९३८ में हरिद्वार में महाकुम्भ लगा था, वहाँ पर स्वामी जी के साथ प्रथम आचार्य श्री भी विधमान थे, साथ ही अनेक शिष्य भी उपस्थित थे । इस शुभ अवसर पर ही स्वामी जी अपने उत्तराधिकारी के रूप में उनको तिलक लगाकर सबके सामने उदघोषणा कर दी । इस घटना के बारे में प्रथम आचार्य जी लिखते है -
“सदगुरुदेव सप्त्स्त्रोत गंगाघाट पर शिष्य समूह के समक्ष चैत्र शुक्ल चतुर्दसि वि० स० 1935 इ० स० 1938 को मुझे प्रातः काल अपना उतराधिकार अभिषेक तिलक दिया । मुझे बहुत याद है कि तिलक करते समय धीमे स्वर में स्वामी जी ने कहा था कि पंद्रह वर्ष पूर्व हो रहा है । परन्तु पंद्रह वर्ष पूर्व के रहस्य से यह नहीं विदित हो सका कि आपने पन्द्रहवें वर्ष के अंत में अपने शरीर के त्यागने की ही वाणी प्रकट की है । स्वामी जी ने इस वाक्य को धीमे स्वर में छिपे हुए भाव लेकर कहा था ।"
इस प्रकार प्रथम आचार्य जी को उत्तराधिकारी बनाकर, स्वामी जी का अधिकांश समय प्रचार कार्य में लगने लगा और प्रथम आचार्य जी संत समाज के सभी कार्य सम्हालने लगे । पत्राचार से लेकर आश्रम व्यवस्था के साथ–साथ स्वामी जी के ग्रंथों की प्रतिलिपि भी तैयार करने में व्यस्त रहने लगे । स्वामी जी अपने जीवन काल में 35 पुस्तकों की रचना की थी और इन सभी पुस्तकों की प्रकाशन की व्यवस्था अपने संस्थान में नहीं था । स्वामी जी के इन पुस्तकों की प्रतिलिपि आचार्य श्री ही बनाते थे और छपाई के लिए बाहर के प्रेस में देते थे । कभी–कभी पुस्तकों की छपाई के कारण आचार्य श्री को महीने-महीने प्रेस में ही रहना पड़ जाता था, क्योंकि पुस्तकों का प्रकाशन में पाण्डुलिपि से लेकर प्रूफ रीडिंग तक का कार्य आप को ही देखना पड़ता था । प्रेस की कठिनाइयों को देखकर स्वामी जी सोचे की अब अपना एक प्रेस होना चाहिए और शीघ्र ही गया में अपना अध्यात्मिक यन्त्रालय की स्थापना एक किराये के मकान में हो गयी । इसी गया के प्रेस से विहंगम योग की अध्यात्मिक मासिक पत्रिका 'सद्गुरु सन्देश' का प्रकाशन होने लगा और इसका प्रथम अंक १९५० में निकला । यानि आज जो हम सब मासिक पत्रिका पढ़ते हैं, उसका प्रकाशन ७१ साल से हो रहा है । इस तरह पत्रिका के अलावे अन्य वाङ्गमय का प्रकाशन चालू हो गया और यह पूरा कार्य प्रथम आचार्य श्री को कुछ दिनों के बाद से ही देखना पड़ा और आचार्य श्री को इतना भी समय न मिलने लगा कि चाहकर भी भजन करते । यही आशंका आप के मन में हुआ कि स्वामी जी तो कभी हिमालय में, कभी दंडक वन में, कभी प्रयाग की गुफा में योग अनुष्ठान करते रहते हैं और यहाँ मुझे भजन का समय ही नहीं मिलता है । सदगुरुदेव भगवान आशंका दूर करने के लिए सन्देश दिए आचार्य श्री को - "भजन करना मेरा काम है, जो मिनटों में हो जायेगा, आप दायित्व वहन करें"। इसके बाद शांतचित से प्रथम आचार्य जी स्वामी जी के द्वारा दिए गये दायित्वों का जीवन पर्यन्त निर्वहन करते रहे । स्वामी जी का आदेश पालन ही उनके लिए भजन बन गया और वे अपने मन से भजन करने के भाव को निकाल दिए ।
प्रथम आचार्य जी ने अपना शरीर त्याग गंगा तट बलिया में किया था और स्वामी जी के कहे अनुसार उनकी समाधि वृत्तिकुट आश्रम पर बनी ।