हे संकल्पित मन श्रेष्ठ कर्मों का स्मरण कर | ईशावास्योपनिषद अध्ययन कक्षा | मन्त्र 17
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हे संकल्पित मन श्रेष्ठ कर्मों का स्मरण कर | ईशावास्योपनिषद अध्ययन कक्षा | मन्त्र 17
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वायुः अनिलम अमृतम अथ इदम भसमान्तग्म शरीरम
ॐ क्रतो स्मर, कृतग्म स्मर, क्रतो स्मर, कृतग्म स्मर।
17.
वायुः (प्राणवायु) अनिलम् (समग्र वायु) अमृतम् (अविनाशशीत)अथ (अब) इदम् (यह) भस्मान्तम् (भस्म होने वाला) शरीरम् (भौतिक शरीर)ॐ (प्रणव ओंकार)क्रतो (हे संकल्पशक्ति वाले मन)
स्मर (स्मरण कर) कृतम् (जो कर्म किया है) स्मर (स्मरण कर)
प्राण महाप्राण(ब्रह्माण्डीय प्राण) में (लीन हो) जो अविनाशी है, इसके पश्चात् यह शरीर अग्नि द्वारा भस्म हो ,
ॐ, हे मन स्मरण कर, स्मरण कर अपने कर्मों को, हे मन
स्मरण कर - स्मरण कर अपने कर्मों को
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अगर आप 60 दिन की ब्रह्म मुहूर्त ध्यान के मॉनिटरिंग कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं तो इस पुस्तक को प्राप्त करें जिससे आपका स्वतः उसमे पंजीकरण हो जायेगा।
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सूर्योदय से पूर्व का समय ब्रह्म मुहूर्त के नाम से जाना जाता है। यह वह अद्भुत चमत्कारिक पल होते हैं जिनके सदुपयोग के द्वारा मनुष्य अपने भीतर बहुत कुछ विकसित और बदल सकता है। इसे अमृत बेला यूँ ही नहीं कहा जाता, इन क्षणों में प्रकृति शान्त और जागृत होती है। सूक्ष्म ऋषि सत्ताएं ज्ञानियों के अनुसार इस समय एक विशेष प्रवाह प्रसारित करती हैं। वह प्रवाह अनेकों स्तरों पर हमारे पूरे जीवन को प्रभावित करता है। इतना ही नहीं और भी बहुत कुछ।
ध्यान एक अवस्था है जिसकी तैयारी मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन आचरण से हो कर ही जाती है। कहते हैं न की जो भाव जीव के भीतर उसके अंतिम क्षण में होता है वही उसके अगले जन्म का आधार बनता है। यहाँ एक भाव समझने योग्य महत्वपूर्ण है की वह अंतिम क्षण का भाव भी सम्पूर्ण जीवन की तैयारी का ही परिणाम होता है , ठीक उसी प्रकार ध्यान भी एक लम्बी तैयारी की फलश्रुति है। श्रीमद भगवद गीता से अधिक सुंदर स्वरूप में यह बोध और अन्य कहाँ प्राप्त होता है।
इस सम्पूर्ण विवेचना को आप एक अध्यापक की कक्षा जान कर ही पढ़ना। #gitaonline #vedanta #ishavasya