सिर्फ एक बार हाथ जोड़ने से मिला देवलोक! 🤔 मट्ठकुण्डली की कथा और वंदन का महापुण्य | Bhante Yash
Buddhism In Hindi
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सिर्फ एक बार हाथ जोड़ने से मिला देवलोक! 🤔 मट्ठकुण्डली की कथा और वंदन का महापुण्य | Bhante Yash
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नमो बुद्धाय 🙏
'Buddhism In Hindi' के इस विशेष व अत्यंत प्रेरणादायक धम्म देशना में पूजनीय भंते यश जी (Bhante Yash) ने वर्षावास के पावन महत्व, मट्ठकुण्डली (Matthakundali) की कथा, केवल हाथ जोड़कर वंदन करने (अञ्जलि-कम्म) के अद्भुत विपाक तथा बालू का स्तूप बनाकर पूजा करने वाले महाऋषि के अरहंत बनने की रोमांचक कथा का बहुत ही सुंदर, भावपूर्ण व शिक्षाप्रद वर्णन किया है [00:43, 03:29, 06:21, 15:39, 17:27, 29:15]:
📌 इस वीडियो के मुख्य बिंदु:
वर्षावास और क्षण-सम्पत्ति का महत्व:
अरबों प्राणियों व जीवों के बीच मनुष्य जन्म, तथागत बुद्ध की विशुद्ध देशना का श्रवण और पुण्य संचय करने का अवसर मिलना अत्यंत दुर्लभ क्षण-सम्पत्ति है [00:43, 01:27, 02:18, 02:53]।
मट्ठकुण्डली और कंजूस अदिन्नपुब्बक सेठ का प्रसंग:
महाकंजूस पिता द्वारा पुत्र के इलाज में धन न लगाना और मृत्यु-शय्या पर बाहर कॉरिडोर में सुला देना [03:29, 05:10, 05:38]।
अंतिम क्षणों में तथागत बुद्ध के शांत व तेजोमय रूप के दर्शन कर केवल हाथ जोड़कर (मुदित मन से अञ्जलि कर) शरण जाना और तावतिंस देवलोक में उत्पन्न होना [06:21, 07:22, 08:17, 15:39]।
देवपुत्र द्वारा पिता के पास आकर सूर्य-चंद्रमा मांगने का नाटक कर पिता का अंधा शोक व मोह दूर करना और पूरे परिवार को बुद्ध की शरण में लाकर सोतापन्न बनाना [10:17, 11:30, 12:44, 16:41]।
अतीत कथा: बालू का स्तूप और 3000 स्वर्ण पुष्प:
अतीत काल के एक महाऋषि द्वारा तथागत बुद्ध के गुणों से प्रभावित होकर नदी किनारे बालू का स्तूप बनाना, झाड़ू लगाना और समाधि-बल से 3000 स्वर्ण पुष्प अर्पित कर नित्य क्लेश-रहित मन से वंदन करना [17:27, 20:26, 21:42, 22:12]।
पटिच्चसमुप्पाद श्रवण और बालक का अरहंत होना:
वही ऋषि बुद्ध काल में सोतापन्न माता-पिता के घर जन्म लेते हैं और माता-पिता के मुख से 'पटिच्चसमुप्पाद' (प्रतीत्यसमुत्पाद - अविद्या पच्चया संखारा...) का पाठ सुनते ही सातों वर्ष की आयु में चारों आर्य फल प्राप्त कर अरहंत बन जाते हैं [23:54, 25:24, 28:14, 29:15, 30:50]।
दैनिक जीवन के लिए संदेश: केवल दिखावे से नहीं, बल्कि सच्चे मुदित चित्त से त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) को वंदन करने, शीलों की रक्षा करने और वर्षावास में दान-पुण्य बढ़ाने से ही निर्वाण का मार्ग प्रशस्त होता है [06:43, 22:54, 31:38, 32:48]।
Timestamps / मुख्य भाग:
[00:00:08] - त्रिरत्न वंदना एवं कल्याण मित्र गुरु वंदना
[00:00:43] - वर्षावास, दुर्लभ मानव जीवन और क्षण-सम्पत्ति का महत्व
[00:03:29] - कथा प्रारंभ: अदिन्नपुब्बक कंजूस सेठ और मट्ठकुण्डली का जन्म
[00:05:10] - मट्ठकुण्डली की गंभीर बीमारी और पिता की घोर कृपणता
[00:06:21] - तथागत बुद्ध का आगमन और मट्ठकुण्डली द्वारा मुदित मन से वंदन
[00:08:17] - तावतिंस देवलोक में जन्म और पिता का श्मशान में विलाप
[00:10:17] - देवपुत्र द्वारा सूर्य-चंद्रमा मांगने का दृष्टांत और पिता का प्रबोधन
[00:14:58] - केवल हाथ जोड़कर वंदन करने (अञ्जलि-कम्म) का महाविपाक
[00:16:41] - कंजूस सेठ द्वारा संघ-दान और सोतापन्न फल की प्राप्ति
[00:17:27] - अतीत कथा: महाऋषि द्वारा बालू का स्तूप बनाना और वंदन
[00:23:54] - सोतापन्न माता-पिता के घर महापुण्यवान बालक का जन्म
[00:25:24] - बोधि वृक्ष के नीचे पटिच्चसमुप्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद) का स्मरण
[00:28:14] - माता-पिता से धम्म चांटिंग सुनते ही बालक का अरहंत बनना
[00:30:50] - सारिपुत्त थेर द्वारा प्रव्रज्या और निर्वाण का मार्ग
[00:31:38] - वर्षावास में सच्ची सेवा, श्रद्धा और पुण्य संचय का संदेश
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Namobuddhaya ! Tiruwansarna
𝐈𝐟 𝐲𝐨𝐮 𝐥𝐢𝐤𝐞 𝐯𝐢𝐝𝐞𝐨𝐬 𝐩𝐥𝐞𝐚𝐬𝐞 𝐋𝐈𝐊𝐄 𝐒𝐇𝐀𝐑𝐄 𝐀𝐍𝐃 𝐒𝐔𝐁𝐂𝐑𝐈𝐁𝐄 𝐂𝐇𝐀𝐍𝐍𝐄𝐋
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