भाग 3 | गीत गोविन्द | हिंदी भावार्थ | प्रथम अष्टपदी - श्री हरी के अवतार | जयदेव जी
Vraja Madhuri
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भाग 3 | गीत गोविन्द | हिंदी भावार्थ | प्रथम अष्टपदी - श्री हरी के अवतार | जयदेव जी
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गीत गोविंद एक प्राचीन संस्कृत काव्य है जो राधा-कृष्ण के अद्वितीय प्रेम की और विरह वेदना का अनुपम चित्रण करने वाला अनुपम काव्य है। इस काव्य में श्रीजयदेव ने राधा-कृष्ण के आध्यात्मिक सम्बन्ध के अनुभव को संगीत, रस, और रोमांच से व्यक्त किया है।
गीत गोविंद के माधुर्यपूर्ण शब्द, संगीत, और भावों की मधुरता से, यह काव्य राधा-कृष्ण के प्रेम के आद्यात्मिक अनुभव को व्यक्त करता है। इसमें राधा का कृष्ण से वियोग की पीड़ा का वर्णन है। गीत गोविन्द रसोपासना के मूल ग्रंथों में से है | यह जगन्नाथ जी को अति प्रिय है और उन्हें गाकर उपासक को सुनाना चाहिए |
इस प्लेलिस्ट में गुरु माँ गीत गोविन्द के गूढ़ भाव को व्यक्त कर और राधा कृष्ण के प्रेम की विरह वेदना का मार्मिक और वर्णन कर रही हैं |
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जगन्नाथाष्टकं
कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीत तरलो
मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः
रमा शम्भु ब्रह्मामरपति गणेशार्चित पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥१॥
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥२॥
महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुर सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥
कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरो
रमा वाणी रामः स्फुरद् अमल पङ्केरुहमुखः ।
सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥४॥
रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥५॥
परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥
न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥
हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥
जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ।
सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥९॥
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प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् ।
विहितवहित्रचरित्रमखेदम् ॥
केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ १॥
क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।
धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ॥
केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ॥ २॥
वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना ।
शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना ॥
केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ॥ ३॥
तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम् ।
दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम् ॥
केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥ ४॥
छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन ।
पदनखनीरजनितजनपावन ॥
केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ॥ ५॥
क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् ।
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ॥
केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥ ६॥
वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम् ।
दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ॥
केशव धृतरामशरीर जय जगदीश हरे ॥ ७॥
वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ।
हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ॥
केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ॥ ८॥
निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् ।
सदयहृदयदर्शितपशुघातम् ॥
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥ ९॥
म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् ।
धूमकेतुमिव किमपि करालम् ॥
केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥ १०॥
श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् ।
शृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ॥
केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ॥ ११॥
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0:00 - प्रार्थना (राधा रानी)
1:10 - जगन्नाथष्टकम
5:46 - जगन्नाथष्टकम अर्थ और भाव
7:43 - जगन्नाथ जी का स्वरुप
9:40 - जगन्नाथ जी की कृपा
11:45 - केशव का अर्थ
16:54 - प्रथम अष्टपदी ( श्री हरि के अवतार ) प्रथम मीन अवतार
20:20 - दूसरा अवतार ( कूर्म अवतार )
21:45 - तीसरा अवतार ( नरसिंह अवतार )
30:00 - वामन अवतार और बलि पर अनुग्रह
34:20 - परशुराम अवतार
37:20 - बलभद्र जी का अवतार
39:50 - यज्ञ वराह, बुद्ध अवतार
42:25 - कल्कि अवतार
46:18 - फलश्रुति ( भव सागर से मुक्ति )
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