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सत्ता आम जनता के अधिकारों को फ्री बीज के कारण बलि नहीं चढ़ाया जा सकता है

Shiksha Samaj Sanskriti

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सत्ता आम जनता के अधिकारों को फ्री बीज के कारण बलि नहीं चढ़ाया जा सकता है

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Shiksha Samaj Sanskriti
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मेढ़क को पानी में डालकर तापमान बढ़ाया जा रहा है जनता कितना सहन करेगी अनुमान लगाया जा रहा है उगते सूरज पर ग्रहण लगाकर जुगनुओं की रौशनी में सबको विकसित भारत का सपना दिखाया जा रहा है रफ्ता रफ्ता ही कसा जाता है फांसी का फंदा गले में सियासत देखती है कितना रोया चिल्लाया जा रहा है एक ही दरवाजे से बंद कर सके बचने के सभी रास्ते इसीलिए सबको जालियांवाला बाग लाया जा रहा है जरूरत ही नहीं पड़ती सरकार को इमारत गिराने की अधिकारों की नींव से बस एक ईंट हटाया जा रहा है बस एक ही ऐसा काम था जिसको दुनिया मानती थी उस काम में भी लूट का मिलावट मिलाया जा रहा है बड़े सेठों का कर्जमाफ़ी देश को विकसित कर रहे हैं मगर गरीबों के अधिकार पे पहरा बिठाया जा रहा है परिवर्तन की सारे अच्छे दिन रातों को गिरवी रख दिए क्या बताकर आए थे और अब क्या बताया जा रहा है अब बगुलों का दौर चल रहा है सियासत के गलियों में हंस के कण्ठ में विश्वगुरु का चरस पिलाया जा रहा है संसद को प्रणाम करके और धर्मदंड भी स्थापित करके पता नहीं लोकतंत्र को किस दिशा में भगाया जा रहा है