325:::सुंदर अनंत आनंद
radha bhava lahari "రాగసాగరా"
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325:::सुंदर अनंत आनंद
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radha bhava lahari "రాగసాగరా"
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सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे!
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे! ॥
कुटिल अलकों वाले केशव की —
मैं वही नील वेणी हूँ,
मुरारि को भी मोह ले जो —
वह मेरी अलकों की लहर है।
मेरे केश सँवारने में —
माधव मग्न रहते हैं,
कटि तक लम्बी इस वेणी को —
प्रेम से धीरे गूँथते हैं।
कमल से भी कोमल स्पर्श —
उनके हाथों में उतरता है,
मैं अनन्त आनन्द की मूर्ति —
प्रेम-सागर में डूबती हूँ।
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे!
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे! ॥
मेरे मन के भीतर —
एक गहरा रहस्य है,
क्या यह केवल वेणी-बन्धन —
या प्रेम की अनुभूति है?
क्या यह अन्तर्मन की शुद्धि —
या मिलन की कोई सिद्धि?
अब तो सब कुछ कृष्णमय है —
कृष्ण बिना कुछ भी न दिखता।
न बाहर जाने की इच्छा —
न बाहर जाने की चाह,
हे कृष्ण! मुझे यूँ ही रहने दो —
अपने प्रेम की छाँह।
मैं तो पूरी तरह तुममें —
अपने आपको खो चुकी,
तुममें ही लीन हुई हूँ —
तुममें ही मैं हो चुकी।
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे!
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे! ॥
हे सामजवरगमन! —
मेरी चाल राजहंस-सी,
मेरी वाणी शुक-सी मधुर —
मधु उसमें तुम्हारा ही।
मेरे हाथों की हर ताल —
तुम्हारे लिए ही बजे,
मेरी हथेली में सँभला भाव —
तुम्हारे चरणों में सजे।
आँखें खोलूँ — तुम ही तुम हो,
आँखें मूँदूँ — तुम ही भीतर,
दृश्य बनो तो तुम ही कृष्ण —
ध्यान बनो तो तुम ही अन्तर।
हे नाथ! मुझे प्रेम में बाँधो —
तुम भी मेरे बन्धन में बँधो,
मेरे हृदय में आकर बसो —
मुझसे फिर कभी दूर न जाओ।
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे!
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे! ॥
हे क्षीरसागरशयन! —
मेरा हृदय तुम्हारे लिए,
दूध-सा निर्मल, कोमल —
प्रेम भरा है तुम्हारे लिए।
हे नवनीतचोर कृष्ण! —
मन का माखन चुरा लो,
हे चीरचोर माधव! —
जीवन का आवरण बन जाओ।
हर पल मेरी रक्षा करना —
मेरे नाथ, हे माधव!
हे पद्मनाभ! प्रेम-विह्वला —
मुझे खोजते हुए आओ।
हे रमारमण! मेरे नाथ! —
अन्तरतम के स्वामी,
मेरे हृदय में निवास करो —
तुम ही मेरे अन्तर्यामी।
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे!
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे! ॥
मैंने माँगना सीखा नहीं —
फिर भी आज न जाने क्या माँगूँ,
तुम्हारे सिवा कुछ और न चाहूँ —
ऐसी बुद्धि तुमसे माँगूँ।
जैसे फूल अपने प्रिय से —
कभी अलग नहीं होता,
वैसे ही मुझे अपने पास रखो —
मन तुमसे दूर न होता।
हे धराधर! मेरे अधरों पर —
मधुर प्रेम बनकर आओ,
प्रेम की अमृत-धारा बनकर —
मेरे भीतर उतर जाओ।
हे श्रीधर! मेरी श्री तुम हो —
मेरा जीवन तुम ही हो,
मुझे सँवारकर अपने प्रेम से —
अपने समीप ले चलो।
हे माधव! अपने समीप —
अपने प्रेम में ले चलो!
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे!
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है, हे हरे! ॥
सुन्दर... अनन्त... आनन्द...
कृष्णमय यह अन्तर है।
सुन्दर... अनन्त... आनन्द...
तुम ही मेरे जीवन हो।
सुन्दर अनन्त आनन्द —
यही तो है... हे हरे!
यही तो है... हे हरे! ॥
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