Kabir Saheb ke Dohe । कबीर साहब के दोहे । Part 2
Kabir Saheb Bhajan
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0:00 चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह ।
जिनको कुछ नहीं चाहिए, वे शाहन के शाह ॥
1:16 आए हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ चले, एक बंधें जंजीर।।
2:35 सहकामी सुमिरन करै, पावै उत्तम धाम ।
निष्कामी सुमिरन करै, पावै अविचल राम ॥
3:52 बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जाके राम आधार ।।
4:32 वृक्ष बोला पात से, सुन पत्ते मेरी बात ।
इस घर की ये रीति है, एक आवत एक जात ।।
5:47 मांस मांस सब एक है, मुर्गी हिरनी गाय ।
आंख देखी नर खात है, ते नर नरकहिं जाए ।।
6:31 झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
जगत चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।।
7:14 अपना तो कोई नहीं, देखा ठोक बजाय ।
अपना अपना क्या करे, मोह भरम लपटाय ॥
7:54 राम नाम कडुआ लगे, मीठा लागे दाम।
दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम।।
8:34 रचनहार को जान ले, खाने को क्या रोय।
मन मंदिर में पैठ के, तान पिछोरी सोय।।
9:14 तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए।
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए।।
9:55 गुरु को मानुष जानते, ते नर कहिए अन्ध।
होय दुखी संसार मे, आगे जम की फन्द।।
10:34 मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत।
कहै कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीत ॥
11:14 साधो संगत साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खांड भोजन मिलै, साकट संग न जाय॥
12:01 चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह ।
जिनको कुछ नहीं चाहिए, वे शाहन के शाह ॥
13:24 आस - पास जोधा खड़े, सबै बजावै गाल।
बीच महल से ले चला, ऐसा परबल काल।।
14:45 साधो सब सुख राम हैं, औरहि दुख की रासि।
सुर नर मुनि अरु असुर सुर, पड़े काल की फांसि ॥
16:07 एक दिन ऐसा होएगा, कोई काहू का नाहिं।
घर की नारी को कहै, तन की नारी जाहि ।।
17:30 प्रेम बिना नहीं भेष कुछ, नाहक का संवाद।
प्रेम भाव जब लग नहीं, तब लग बाद विवाद॥
18:51 हाड़ जलै ज्यों लाकड़ी, केस जलै ज्यों घास।
सब जग जलता देख के, भए कबीर उदास।।
20:11चले गए सो ना मिले, किसको पूछूं बात।
मात पिता सुत बाँधवा, झूठा सब संघात ।।
21:34 आतम अनुभव जब भयो, तब नहीं हर्श विशाद।
चित्र दीप सम होए रहै, तजि करि बाद-विवाद।।
22:55 जिन पावन भुइं बहु फिरे, घूमें देस बिदेस।
पिया मिलन जब होइया, आंगन भया बिदेस ।।
24:14 रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय॥
24:56 कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।।
25:35 जाता है सो जान दे, तेरी दसा न जाए ।
खेवटिया की नाव ज्यूं, घने मिलेंगे आए ।।
26:13 दौड़त दौड़त दौड़िया, जेती मन की दौड़ ।
दौड़ि थके मन थिर भया, वस्तु ठौर की ठौर।।
27:29 झूठा सब संसार है, कोउ न अपना मीत।
राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत ॥
28:45 विषय वासना उरझि कर, जनम गंवाया बाद।
अब पछितावा क्या करै, निज करनी कर याद ।।
30:03 जे तू राखे साइयां, मार सके ना कोय ।
बाल ना बांका कर सके, जो जग बैरी होय ।।
30:40 चाकी चाकी सब कहे, कीली कहे ना कोय ।
जो कीली से लाग रहे, बाल ना बांका होय ।।
31:22 मोटी माया सब तजै, झीनी तजी न जाय ।
पीर पैगम्बर औलिया, झीनी सबको खाय।।
32:46 पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़। ता से तो चक्की भली, पीस खाए संसार।।
34:11 मनुवा तो पंछी भया, उड़ि के चला अकास।
ऊपर ही ते गिर पड़ा, मन माया के पास।।
35:34 बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोए।
जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोए।।
36:57 यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं ।
सीस उतारे भुंई धरे, तब बैठें घर माहिं॥
38:21 प्रेम प्रेम सब कोइ कहे, प्रेम न चीन्हे कोय।
जा मारग साहब मिले, प्रेम कहावे सोय ।।
39:47 माया दोय प्रकार की, जो कोय जाने खाय।
एक मिलावे राम से, एक नरक ले जाय।।
41:08 माया छोड़न सब कहे, माया छोड़ी न जाय ।
छोड़न की जो बात करूं, बहुत तमाचा खाय ।।
41:48 आछे दिन पाछे गए, हरि से कियो न हेत ।
अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत।।
43:12 हरिजन तो हारा भला, जीतन दे संसार।
हारा तो हरि सो मिले, जीता जम के द्वार।।
44:33 आतम अनुभव जब भयो, तब नहीं हर्श विशाद ।
चित्र दीप सम होए रहै, तजि करि बाद-विवाद।।
45:56 कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।।
47:16 बहता पानी निर्मला, बंधे सो गंदा होए।
साधु जन रमता भला, दाग न लागे कोये ।।
48:37 जाता है सो जान दे, तेरी दसा न जाए ।
खेवटिया की नाव ज्यूं, घने मिलेंगे आए ।।
49:55 दौड़त दौड़त दौड़िया, जेती मन की दौड़ ।
दौड़ि थके मन थिर भया, वस्तु ठौर की ठौर।।
51:15 झूठा सब संसार है, कोउ न अपना मीत।
राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत ॥
52:33 विषय वासना उरझि कर, जनम गंवाया बाद।
अब पछितावा क्या करै, निज करनी कर याद ।।
53:51 जे तू राखे साइयां, मार सके कोय ।
बाल ना बांका कर सके, जो जग बैरी होय ।।
55:09 गुरु मिले तो सब मिला, न तो मिला न कोय।
मात पिता सूत बांधवा, ये तो घर घर होय।।
55:46 अधिक सनेही माछरी, दूजा अल्प सनहे।
जबहीं जल तें बीछुरै, तबही त्यागै देंह।।
56:26 जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं ।
प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाहीं ॥