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देव ऋषि नारद जी की भक्ति से भेट। GLORY OF BHAGWAT - Adhyay 1: Part 1

KathaAmrit 001

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देव ऋषि नारद जी की भक्ति से भेट। GLORY OF BHAGWAT - Adhyay 1: Part 1

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श्रीमद्भागवत माहात्म्य, अध्याय 1: नारद की भक्ति से भेंट यमुना के तट पर एक युवती बैठी है। तेजस्विनी। व्याकुल। उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेत पड़े हैं, हाँफते हुए, बेसुध। सैकड़ों स्त्रियाँ उसे पंखा झल रही हैं, बार-बार समझा रही हैं। फिर भी कुछ काम नहीं आता। देवर्षि नारद ने पृथ्वी के हर तीर्थ की यात्रा कर ली, पर कहीं शांति नहीं मिली। कलि का धुआँ हर ओर फैला है: साधु पाखंडी बन गए, पवित्र नदियाँ दूसरों के अधिकार में हैं, विद्वान वेद बेच रहे हैं। तभी उनकी दृष्टि उस पर पड़ती है। उसका प्रश्न हवा में ठहरा रहता है: मैं तरुणी क्यों हूँ, और मेरे पुत्र बूढ़े क्यों? तब कहीं जाकर वह अपना नाम बताती है: भक्ति। उसके पुत्र हैं ज्ञान और वैराग्य। वह अपनी कथा सुनाती है। द्रविड़ में जन्मी। कर्णाटक में बढ़ी। महाराष्ट्र में सम्मानित हुई। गुजरात में टूट गई। वृन्दावन ने उसे फिर तरुणी कर दिया। पर उसके पुत्रों को न जगा सका। इससे पहले सूतजी सुनाते हैं कि देवताओं ने शुकदेवजी की भागवत-कथा के बदले अमृत देना चाहा, और शुकदेवजी ने उसे ठुकरा दिया। ब्रह्माजी ने सत्यलोक में तराजू पर सब साधनों को तौला। भागवत सबसे भारी निकली। अध्याय का अंत नारदजी को उसके नमस्कार पर होता है। उपाय अभी अनकहा है। *** Contact US. Email - Kathaamrit001@gmai.com