स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा: साक्षीभाव की सरल कला
Beyond Philosophy Osho
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स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा: साक्षीभाव की सरल कला
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Beyond Philosophy Osho
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मनुष्य प्रायः ध्यान करना चाहता है, लेकिन जैसे ही वह आँखें बंद करके बैठता है, विचारों की एक लंबी श्रृंखला उसके भीतर चलने लगती है। कभी बीते हुए कल की स्मृतियाँ, कभी भविष्य की कल्पनाएँ, कभी इच्छाएँ और कभी अनावश्यक चिंताएँ। वह विचारों को रोकने का प्रयास करता है, लेकिन जितना अधिक उन्हें रोकना चाहता है, उतना ही अधिक उलझता चला जाता है।
इसका एक सरल उपाय है—स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ना।