Перейти к содержимому

बांजे डालू कु छैल सूणो... त्वे बिण कुएड़ी रोई | #गढ़वाली #लोकगीत @dhruvrana770

Dhruv rana Official

0:00 / 0:00

बांजे डालू कु छैल सूणो... त्वे बिण कुएड़ी रोई | #गढ़वाली #लोकगीत @dhruvrana770

10 193 просмотра · 4 месяца назад
Dhruv rana Official
1,88 тыс. подписчиков
10 193 просмотра · 4 месяца назад
🎵 बांजे डालू कु छैल सूणो... त्वे बिण कुएड़ी रोई | गढ़वाली लोकगीत गढ़वाल की वादियों, बांज के जंगलों, पहाड़ी धुंध और विरह की गहरी भावनाओं से सजा यह लोकगीत प्रेम और बिछड़न की कहानी कहता है। इस गीत में "बांजे डालू कु छैल" का अर्थ है बांज के पेड़ की डाल की छाया, जहाँ कभी प्रेम की यादें बसी थीं। वहीं "कुएड़ी" गढ़वाली बोली में पहाड़ों पर छाने वाले कोहरे या धुंध को कहा जाता है। गीत का भाव यह है कि जब प्रिय दूर हो जाता है, तो केवल मन ही नहीं, बल्कि प्रकृति भी उसकी कमी महसूस करती है। बांज की सूनी छाया, पहाड़ों पर बिछी कुएड़ी (धुंध), ठंडी बयार, बादलों में छिपता चाँद और विरह में जागती आँखें मिलकर एक ऐसी अनुभूति रचते हैं, जो हर पहाड़ी दिल को छू जाती है। "त्वे बिण कुएड़ी रोई" केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि उस अकेलेपन का प्रतीक है जहाँ पूरी प्रकृति प्रेमी के दुख में सहभागी बन जाती है। 🎤 गायक: ध्रुव राणा ✍️ गीतकार: बलवंत राणा 🎼 संगीत रचना: Suno Pro AI Platform 🎬 संपादन: बलवंत राणा 🎥 निर्माता: बलवंत राणा उत्तराखंड की लोकभाषा, लोकसंस्कृति और लोकसंगीत को समर्पित यह गीत आप सभी श्रोताओं के लिए एक भावनात्मक प्रस्तुति है। जय बद्रीविशाल। जय उत्तराखंड। 🏔️❤️ #BanjeDaluKuChhailSunu #GarhwaliLokgeet #DhruvRana #BalwantRana #UttarakhandMusic