बंद कमरे को छोड़ दो,सब ठीक हो जाएगा ||osho Speech in hindi ||#Osho #trending ##viral #Oshomotivation
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बंद कमरे को छोड़ दो,सब ठीक हो जाएगा ||osho Speech in hindi ||#Osho #trending ##viral #Oshomotivation
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बंद कमरे को छोड़ दो,सब ठीक हो जाएगा ||osho Speech in hindi ||#Osho #trending ##viral #Osho-inspired
*ओशो के अनमोल विचार | Osho Inspirational & Spiritual Teachings*
यह चैनल उन सभी साधकों, खोजियों और जिज्ञासुओं के लिए है जो जीवन के गहरे प्रश्नों का उत्तर ढूँढ रहे हैं। यहाँ हम *ओशो जी की शिक्षाओं और विचारों* को नए रूप में प्रस्तुत करते हैं। हर वीडियो में आपको ओशो जी के ही अंदाज़ में *प्रेरणा, ध्यान और आध्यात्मिकता* का अनुभव होगा।
👉 यहाँ प्रस्तुत सभी वीडियो *artificial intelligence तकनीक* की मदद से बनाए गए हैं, जिनमें Osho जी की आवाज़ और शैली को पुनः निर्मित किया गया है ताकि आप उनके विचारों को नए युग की तकनीक के साथ सुन सकें।
👉 उद्देश्य केवल और केवल *प्रेरणा व आंतरिक जागृति* फैलाना है।
👉 यदि आप भी जीवन की सच्चाई, प्रेम, ध्यान और आत्मज्ञान की तलाश में हैं तो यह चैनल आपके लिए है।
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🕉️ ओशो जी के संदेश
जीवन को एक उत्सव बनाओ
ध्यान ही मुक्ति का मार्ग है
प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है
वर्तमान क्षण में जीना ही सच्चा जीवन है
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📌 इस चैनल पर आपको क्या मिलेगा?
Osho Ji की *Spiritual Talks*
*Meditation Techniques*
*Life Transformation Wisdom*
*Inspirational Thoughts & Quotes*
AI के माध्यम से *Osho Voice Experience*
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एक बात अपने दिल में उतार लो। मनुष्य की जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक लड़ाई वह है, जो वह अपने ही शरीर के साथ लड़ता है। जिस शरीर के सहारे वह इस संसार में आया, जिस शरीर के माध्यम से वह प्रेम महसूस करता है, सुख महसूस करता है, दुख महसूस करता है, उसी शरीर की कुछ स्वाभाविक इच्छाओं को देखकर वह अपने आप से नफरत करने लगता है। उसके भीतर कोई यौन इच्छा उठती है, कोई कल्पना जन्म लेती है, हस्तमैथुन करने की इच्छा होती है, तो वह तुरंत अपने मन में अदालत लगा देता है। वह स्वयं ही अपराधी बन जाता है, स्वयं ही न्यायाधीश बन जाता है और स्वयं ही अपने आपको सजा देने लगता है।
वह कहता है, मैंने गलत कर दिया। मैं कमजोर हूँ। मुझमें इच्छाशक्ति नहीं है। मैं अपनी जिंदगी में कभी सफल नहीं हो पाऊँगा। मेरी ऊर्जा खत्म हो गई। मेरा शरीर कमजोर हो जाएगा। मेरा दिमाग खराब हो जाएगा। और फिर वह इन्हीं विचारों को लेकर घंटों बैठा रहता है। लेकिन जरा ठहरकर सोचो, क्या वास्तव में उसका सबसे बड़ा नुकसान हस्तमैथुन करने से हुआ है, या उस अपराधबोध से हुआ है, जिसे उसने अपने मन के भीतर पाल लिया है?
यहीं से हमारी बात शुरू होती है।
आज हम किसी बात को छिपाकर नहीं बोलेंगे। हम मैथुन की बात करेंगे, हस्तमैथुन की बात करेंगे, यौन इच्छाओं की बात करेंगे, वीर्य को लेकर मन में बैठे डर की बात करेंगे और उस मानसिक कैद की बात करेंगे, जिसमें बहुत से लोग अपने ही शरीर से डरकर जीवन बिताते हैं। क्योंकि जब तक तुम किसी विषय को समझने के बजाय उससे भागते रहोगे, तब तक वह विषय तुम्हारे मन में बार-बार लौटता रहेगा।
लेकिन याद रखना, खुलकर बात करने का अर्थ यह नहीं कि हर इच्छा के पीछे भागा जाए। खुलकर बात करने का अर्थ है कि जो सच है, उसे समझा जाए; जो भ्रम है, उसे छोड़ा जाए; और जहाँ अपनी आदतों पर नियंत्रण की जरूरत है, वहाँ खुद को समझदारी से संभाला जाए।
अगर तुम भी अपने शरीर, अपनी इच्छाओं और अपने मन को बेहतर ढंग से समझना चाहते हो, तो इस विचारयात्रा में अंत तक जुड़े रहना। हो सकता है, आज तुम अपने बारे में कुछ ऐसा समझो, जो तुम्हें वर्षों पहले समझ जाना चाहिए था।
मनुष्य के भीतर कामेच्छा क्यों उठती है? कामेच्छा यानी यौन आकर्षण या यौन सुख की इच्छा। यह मानव जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा है। अलग-अलग लोगों में इसकी तीव्रता अलग हो सकती है। किसी व्यक्ति को अक्सर यौन इच्छाएँ महसूस होती हैं, किसी को कभी-कभी और किसी को बहुत कम। उम्र, शरीर, हार्मोन, भावनात्मक स्थिति, तनाव, रिश्ते और जीवन की परिस्थितियाँ इन इच्छाओं को प्रभावित कर सकती हैं।
लेकिन परेशानी तब शुरू होती है, जब मनुष्य इस स्वाभाविक भावना को समझने के बजाय इसे अपनी पूरी जिंदगी का सबसे बड़ा शत्रु बना लेता है।
कल्पना करो, किसी व्यक्ति को प्यास लगती है। वह पानी पीता है और उसकी प्यास शांत हो जाती है। अब अगर वह हर बार प्यास लगने पर खुद को अपराधी समझने लगे, तो क्या यह समझदारी होगी? नहीं। क्योंकि प्यास शरीर का संकेत है। उसे समझना और उचित तरीके से उसका समाधान करना जरूरी है।
इसी तरह शरीर में यौन इच्छा उठना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि तुम बुरे हो, कमजोर हो या तुम्हारे भीतर कोई दोष है। इच्छा एक अनुभव है। तुम्हारा व्यवहार एक चुनाव हो सकता है। इन दोनों के बीच अंतर समझना जरूरी है।
तुम्हारे मन में कोई विचार आ सकता है, लेकिन हर विचार पर अमल करना जरूरी नहीं। तुम्हारे भीतर कोई इच्छा उठ सकती है, लेकिन हर इच्छा को पूरा करना भी जरूरी नहीं। और किसी इच्छा का उठना तुम्हें अपराधी नहीं बना देता।
यही समझदारी है। यही जागरूकता है।
अब हस्तमैथुन की बात करते हैं। इस शब्द को सुनते ही बहुत से लोगों के मन में शर्म, डर और अपराधबोध जाग जाता है। कुछ लोग इस विषय पर बात करने से भी घबराते हैं। वे सोचते हैं कि इसके बारे में बात करना ही गलत है। लेकिन किसी व्यवहार को समझने के लिए उसके बारे में साफ भाषा में बात करना आवश्यक है।
सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति ने हस्तमैथुन किया या नहीं। जरूरी सवाल यह है