1998 की वो दोपहर, जगजीत सिंह और मेरी बड़ी दीदी की यादें | एक अनकहा संस्मरण
Kunal Ki Mehfil
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1998 की वो दोपहर, जगजीत सिंह और मेरी बड़ी दीदी की यादें | एक अनकहा संस्मरण
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साल 1998 की उस दोपहर में जब बड़ी दीदी को देखने होने वाले जीजाजी आए थे, तो हमने बातों-बातों में उनसे पूछ लिया था— "आपका पसंदीदा गायक कौन है?" उनका जवाब था, जगजीत सिंह।
उसके बाद आए कैसेट्स— 'सिलसिले' और 'फेस टू फेस'... और वहाँ से शुरू हुआ सुरों का वो सफर जो आज तक जारी है। 2011 में जब जगजीत साहब इस दुनिया को अलविदा कह गए, तो उसी दर्द और मोहब्बत से इस पेज की नींव पड़ी— 'जब सामने तुम आ जाते हो'।
आज जब अक्टूबर का यह वक्त लौटता है, तो दिल सिर्फ जगजीत साहब के लिए ही भारी नहीं होता... मेरी वो बड़ी दीदी भी आज हमारे बीच नहीं हैं। दीदी का वो आखिरी हौसला कि "भाई तू चिंता मत कर, एक दिन सब अच्छा होगा" और जगजीत साहब का जीवन-संघर्ष, आज भी मुझे हर कदम पर आगे बढ़ने की हिम्मत देता है। यह दास्तान उसी अपनेपन, यादों और रूहानी रिश्ते को समर्पित है।
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