माँ दुर्गा महिषासुरमर्दिनी क्यों कहलाईं? | कात्यायनी कथा | नवरात्रि दिन 6
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माँ दुर्गा महिषासुरमर्दिनी क्यों कहलाईं? | कात्यायनी कथा | नवरात्रि दिन 6
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नवरात्रि का छठा दिन: माँ कात्यायनी और माँ छिन्नमस्ता — सब देवताओं के तेज से प्रकट हुईं वे माँ, जिन्होंने महिषासुर का सामना किया, और वह महाविद्या, जिनका नाम चौंकाता है, पर कथा प्रेम की है।
माँ कात्यायनी, नवदुर्गा का छठा रूप, महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट होती हैं, और रूप बदलते महिषासुर को परास्त करती हैं — महिषासुरमर्दिनी। माँ छिन्नमस्ता, छठी महाविद्या, भूखी सखियों के लिए स्वयं को दे देती हैं — अहंकार कटा, बचा बस देना। साथ में — सही के लिए खड़े होने और श्रेय की चाह के बिना देने की सीख, और गोपियों का कात्यायनी व्रत।
📿 समापन के श्लोक (देवी माहात्म्य, अध्याय 5)
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में बसी हैं — उन्हें बार-बार नमस्कार।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में माँ के रूप में बसी हैं — उन्हें बार-बार नमस्कार।
⏱️ अध्याय
0:00 जब देवताओं ने अपना तेज दिया
0:12 महिषासुर
0:48 माँ कात्यायनी
2:23 माँ छिन्नमस्ता
3:24 इस कथा की सीख: साहस और निःस्वार्थ त्याग
4:28 गोपियों का कात्यायनी व्रत
5:20 या देवी सर्वभूतेषु — समापन
📖 कथा देवी माहात्म्य (अध्याय 2–3) पर आधारित है; कात्यायन ऋषि का प्रसंग परंपरा से है; माँ छिन्नमस्ता की कथा शाक्त परंपरा से है, और उन्हें केवल प्रतीक रूप में दिखाया गया है। कथाओं और परंपराओं में भिन्नता होती है।
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