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HIMALAYAN HIGHWAYS| ससुराल के गाँव वाण में बहू बन पहुंची माँ नंदा का आगमन | UTTARAKHAND| CHAMOLI

Himalayan Highways

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HIMALAYAN HIGHWAYS| ससुराल के गाँव वाण में बहू बन पहुंची माँ नंदा का आगमन | UTTARAKHAND| CHAMOLI

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‪@HimalayanHighways‬ हिमालयन हाइवेज। HIMALAYAN HIGHWAYS उत्तराखण्ड के सुदृर में भादों के महीने माँ नन्दा की ससुराल विदाई और विदाई की इन तस्वीरों के बीच आज आप पहुंचे है इष्टदेवी मां नन्दा के ससुराल में..... ससुराल इष्टदेवी का हो तो रीति रिवाजों और लोकसंस्कृति के रंग यहां खिलेंगे ही लेकिन उससे भी ज्यादा वो परम्पराएं जिनको ससुराल आज भी पूरी निष्ठा से निभा रहा है। नन्दा के ससुराल का गांव जहां सबसे पहले नन्दा मिलती है अपने धर्मभाई लाटू देवता से। ढोल दमाऊं की थाप पर भाई बहन का ये मिलन कुछ पलों के लिए सब कुछ भुला जाता है। सदियों से अपनी पौराणिक पहचान को संजोए रखें, अपने रीति रिवाजों पर गौरवान्वित होते, मां नन्दा की डोली को अपने कंधों पर उठाते ये इष्टदेवी नन्दा का ससुराल वाण गांव है। यहां नन्दा हमेशा से एक बहु की तरह आती है लेकिन प्यार बेटी जैसा पा जाती है। नमस्कार हिमालयन हाइवेज के एक ओर एपिसोड में आपका स्वागत है। नन्दा लोकजात यात्रा के आखिरी चरण में आज हम आपके लिए लेकर आये है माँ नन्दा का ससुराल वाण गांव। सुदृर हिमालय की तलहटी में बसा ये खूबसूरत गांव आज भी उत्तराखण्ड के अतीत को आपके सामने ला जाता है। लोकजागरों कि धुन पर कदमों की जुगलबंदी यहां बर्फीले मौसम की चुभती ठंड को पीछे छोड़ जाती है। अपनी पहचान को जीवित रखने की ऐसी जिद शायद ही कही और देखने को मिले। धार्मिक आयोजनों में लोकसंगीत के ये सुर ना जाने कितनी सदियों से इसे ही इस शांत क्षेत्र को ऊर्जावान किये जा रहे है। कुरुड़ से शुरू मां नन्दा का सफर अपने मैतियो से मिलकर उनसे भेंट लेने और आशीष देने के साथ पहुंचता है अपने ससुराल के गांव वाण में। कैलास विदाई से पहले वाण गांव आखिरी आबादी क्षेत्र है और यहां से मां नन्दा मैतियों की भेंट लेकर अपने ससुरालियों के कंधे पर डोली में बैठ आगे का सफर करती है। वाण गांव में मां नन्दा के धर्मभाई लाटू देवता से मिलन की तस्वीरें बेहद भावुक माहौल तैयार करती है। कैलास पर्वत के दुर्गम सफर में लाटू देवता ही मां नन्दा की अगुवानी करते है और इसका असर आज भी यहां रहने वाले लोगों पर नजर आता है। वाण गांव में नन्दा को कैसा सम्मान दिया जाता है इसको आप इन रीति रिवाजों से भी समझ सकते है। लोहाजंग से वाण गांव पहुंचने पर पूरा गांव अपनी बहू के स्वागत में उमड़ता है। बहु के ससुराल पहुंचने से पहले ही यहाँ पौराणिक लोकजागर नन्दा के स्वागत के लिए तैयार रहते है। ढोल दमाऊं की थाप पर मां नन्दा की डोली के यहां पहुंचते ही परम्पराओं से पूजन शुरू होता है और इस दौरान मां नन्दा ओर धर्मभाई लाटू देवता अवतरित होकर एक दूसरे से मिलते है। सुदृर में बसे वाण गांव की अपनी पहचान आज भी बेहद मेहनती और हर मुश्किलों से लड़ने वाले लोगों से रही है। पहाड़ों की ऊंचाई को मिनटों में तय करने वाले यहां के स्थानीय लोग हर साल मां नन्दा की डोली को बेदनी कुंड तक पहुंचाते आये है। राज जात आयोजन के वक्त वाण से आगे के निर्जन पड़ावों में ससुराल का यही गांव लाटू देवता की अगुवानी में मां नन्दा को विदा करता आया है। मौसम कैसा भी हो, मुश्किले कितनी भी आएं लेकिन बात परम्पराओं की हो तो यहां सब कुछ नियत हो जाता है। वाण गांव से मां नन्दा की डोली गैरौली पाताल के लिए रवाना होती है। ससुराल के इस क्षेत्र में मां नन्दा को एक बार फिर वाण गांव विदाई देता है। माँ नन्दा को विदा करते वाण गांव में एक बार फिर लोकजागरों से मां नन्दा के सकुशल सफर की कामना की जाती है। ससुराल के क्षेत्र से होते हुए मां नन्दा दुर्गम कैलाश पर्वत के लिए रवाना होती है। वाण गांव से बेदनी कुंड पहुंचकर हर साल नन्दा सप्तमी को जात के बाद स्थानीय लोग डोली को अगले पड़ाव बांक गांव ले जाते है। हिमालयन हाइवेज के आज के एपिसोड में इतना ही आपको नन्दा के ससुराल से जुड़ा हमारा यह एपिसोड कैसा लगा कृपया कमेंट कर अवश्य बताएं साथ ही हमारे चैनल को जरूर सब्सक्राइब करें| व्हाट्सप्प सम्पर्क- 9634544417 हिमालयन हाइवेज,उत्तराखंड,चमोली,नंदा लोकजात यात्रा,राजजात यात्रा,सिद्धपीठ लाटू धाम वाण,राजराजेश्वरी माँ नंदा,वाण गाँव देवाल,बेदनी कुंड जात,नंदा लोकजागर,